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अभिमन्यु का अमर अध्याय

साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित अभिमन्यु अनत का सोमवार को निधन हो गया। मॉरीशस में जन्मे और पल-बढ़े अभिमन्यु ने विदेश में हिंदी की प्रतिष्ठा में जो नया अध्याय जोड़ा है, उसके लिए वे सदा याद किए जाएंगे।

Author नई दिल्ली, 4 जून। | June 5, 2018 3:26 AM
कई लेखक तो अपने जीवन में एक उपन्यास लिखने के बाद दूसरा नाम इस खाते में जोड़ नहीं पाते, लेकिन अभिमन्यु इस मामले में वाकई योद्धा निकले।

साहित्य अकादमी सम्मान से सम्मानित अभिमन्यु अनत का सोमवार को निधन हो गया। मॉरीशस में जन्मे और पल-बढ़े अभिमन्यु ने विदेश में हिंदी की प्रतिष्ठा में जो नया अध्याय जोड़ा है, उसके लिए वे सदा याद किए जाएंगे। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता डीपी त्रिपाल्ली ने उनके निधन पर शोक जताया है। अभिमन्यु का जन्म मॉरीशस के उत्तर प्रांत के गांव त्रियोले में 9 अगस्त 1937 को हुआ था। 80 साल की जीवन यात्रा में अभिमन्यु सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार, मैथिलीशरण गुप्त सम्मान, यशपाल पुरस्कार, जनसंस्कृति सम्मान और उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान पुरस्कार आदि से सम्मानित किए गए। अभिमन्यु की रचनाओं की मूल प्रवृत्ति काव्यात्मक रही है। यह कहते हुए यह भी ध्यान है कि मॉरीशस में उनकी पहचान उपन्यास सम्राट के रूप में रही है। उनका पहला उपन्यास ‘और नदी बहती रही’ 1970 में छपकर आ चुका था। उसके बाद उनकी कलम रुकी नहीं, बल्कि उपन्यासों के खाते में तकरीबन 28 उपन्यास और जुड़े।

कई लेखक तो अपने जीवन में एक उपन्यास लिखने के बाद दूसरा नाम इस खाते में जोड़ नहीं पाते, लेकिन अभिमन्यु इस मामले में वाकई योद्धा निकले। उन्होंने जीवन के तमाम मोर्चों को करीने से साधा। नौकरी भी की और कलम की छटा भी बिखरते रहे। एक के बाद एक नया उपन्यास लिखते गए। किताबों का संपादन भी किया। कविताएं भी लिखीं और उनका संग्रह भी आता रहा। कहानियां भी खूब लिखीं। पांच संग्रहों में उनकी अधिकतर कहानियां संकलित हैं। अपने आसपास के जीवन से उन्होंने अपनी कहानियों के पात्र चुने हैं। घटनाओं पर उनकी इतनी बारीक नजर रही कि उनका दृश्य उनके जेहन में लंबे समय तक खिंचा रहा और जब ये दृश्य बाहर निकले तो नाटक की शक्ल में बदल गए। अभिमन्यु के प्रकाशित पांच नाटक इसके प्रमाण हैं।

29 उपन्यासों में ‘लाल पसीना’ उनका सर्वश्रेष्ठ उपन्यास माना गया है। संख्या के लिहाज से उपन्यासों की लंबी फेहरिस्त के सामने उनके काव्य संग्रहों की संख्या बौनी दिखती है- महज चार (कैक्टस के दांत, नागफनी में उलझी सांसें, एक डायरी बयान, गुलमोहर खौल उल्ला)। पर जिस ‘लाल पसीना’ उपन्यास की वजह से वह सबसे ज्यादा चर्चित हुए, उसकी भाषा काव्यात्मक है। यानी वह महाकाव्यात्मक उपन्यास है। उनके नाटकों से गुजरते हुए या उनकी कहानियों से गुजरते हुए आपको भाषा में जो तरलता मिलती है वह अंतत: अभिमन्यु की मूल पहचान कवि के रूप में ही रखती है। पर जिस लेखक ने अपने जीवन में लगभग तमाम विधाओं पर सजग और सतर्क होकर अपनी कलम चलाई हो, उसे किसी विधा विशेष में बांध देना उसकी कलम के साथ अन्याय होगा।
इसलिए यह कहना ज्यादा उचित होगा कि अभिमन्यु ने कलम का इस्तेमाल अपने जीवन में बखूबी किया, खूब लिखा, डूबकर लिखा और लिखने में अपनी सहज और तरल भाषा से सबका मन मोहा। ऐसे मनमोहक लेखक की चुपचाप विदाई साहित्य का अपमान होगी, इसलिए जरूरी है अभिमन्यु अनत की विदाई चर्चा, वरना उनकी यह कविता साहित्य पर भी चोट करती रहेगी-

जिस दिन सूरज को
मजदूरों की ओर से गवाही देनी थी
उस दिन सुबह नहीं हुई।

वरिष्ठ पत्रकार और लेखक राजकिशोर का निधन

वरिष्ठ लेखक और पत्रकार राजकिशोर का सोमवार सुबह दिल्ली में निधन हो गया। 71 साल के राजकिशोर पिछले कई दिनों से फेफड़ों में संक्रमण की बीमारी से जूझ रहे थे। पिछले दिनों उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था। कोलकाता में 2 जनवरी 1947 को जन्मे राजकिशोर ने ‘रविवार’ से अपनी पत्रकारिता की शुरुआत की थी और वे नवभारत टाइम्स, दिल्ली से लंबे समय तक जुड़े रहे। उन्होंने ‘दूसरा शनिवार’ पत्रिका का संपादन भी किया था। साथ ही वे जनसत्ता व दैनिक जागरण समेत कई अखबारों में समसामयिक विषयों पर स्तंभ भी लिखते रहे थे।

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