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LG बनाम केजरीवाल: सर्विसेज पर कंट्रोल के मुद्दे पर बंटे जज, बड़ी बेंच को गया मामला

AAP vs LG: इस मामले में बंटा हुआ आदेश आने की वजह से यह मामला अब तीन जजों की बेंच के पास चला गया है।

Author February 14, 2019 2:39 PM
सुप्रीम कोर्ट। (Express Photo by Tashi Tobgyal)

दिल्ली का असली बॉस कॉन, लेफ्टिनेंट जनरल या राज्य के सीएम, काफी वक्त से इस मसले पर अरविंद केजरीवाल की अगुआई वाली आप सरकार और एलजी के बीच टकराव रहा है। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला बुधवार को आया। इस मसले पर दो अलग-अलग जजमेंट आए। कोर्ट ने एक अहम राय यह रखी कि एंटी करप्शन ब्यूरो केंद्र के दायरे में आता है।

जस्टिस सीकरी ने कहा कि एसीबी पर केंद्र सरकार का कंट्रोल है। दिल्ली सरकार के पास पुलिसिंग की ताकत नहीं है। जस्टिस सीकरी ने जॉइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर रैंक के अफसरों के ट्रांसफर और पोस्टिंग को एलजी के दायरे में बताया, जबकि बाकी को दिल्ली सरकार के अंतर्गत बताया। जज के मुताबिक, अगर मतभेद होता है तो एलजी की राय सर्वोपरि होगी।

वहीं, जस्टिस अशोक भूषण ने कहा कि वह जस्टिस सीकरी से ‘सर्विस’ के मुद्दे को छोड़कर बाकी सभी बिंदुओं पर सहमत हैं। सर्विस यानी अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग का मामला।  जस्टिस भूषण ने कहा कि दिल्ली सरकार को कानून बनाने का हक नहीं है। उधर, इस मामले में बंटा हुआ आदेश आने की वजह से यह मामला अब तीन जजों की बेंच के पास चला गया है।

कोर्ट के फैसले के मुताबिक, अधिकारियों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई का अधिकार राष्ट्रपति के पास है। अफसरों पर अनुशासन वाले केस राष्ट्रपति देखेंगे। वहीं, सचिव स्तर तक के अधिकारी पर एलजी फैसले लें।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले की अहम बातें
कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ की इस सवाल पर अलग-अलग राय है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में सेवाओं पर नियंत्रण किसके पास है। कोर्ट ने केंद्र की इस अधिसूचना को बरकरार रखा कि दिल्ली सरकार का एसीबी भ्रष्टाचार के मामलों में उसके कर्मचारियों की जांच नहीं कर सकता। उच्चतम न्यायालय ने कहा कि केंद्र के पास जांच आयोग नियुक्त करने का अधिकार होगा। कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल के बजाय दिल्ली सरकार के पास लोक अभियोजकों या कानूनी अधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार होगा।

कोर्ट के मुताबिक, दिल्ली सरकार के पास बिजली आयोग या बोर्ड नियुक्त करने या उससे निपटने का अधिकार है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपराज्यपाल के बजाय दिल्ली सरकार के पास लोक अभियोजकों या कानूनी अधिकारियों को नियुक्त करने का अधिकार होगा। कोर्ट ने कहा कि भूमि राजस्व की दरें तय करने समेत भूमि राजस्व के मामलों को लेकर अधिकार दिल्ली सरकार के पास होगा । कोर्ट ने यह भी कहा कि उपराज्यपाल को अनावश्यक रूप से फाइलों को रोकने की जरुरत नहीं है और राय को लेकर मतभेद होने के मामले में उसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाना चाहिए ।

(भाषा इनपुट्स के साथ)

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