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अधिकारों के झगड़े में हुई आप की फजीहत

हाई कोर्ट के फैसले के बाद तो उपराज्यपाल ने हर फैसले को नियम-कानून के खिलाफ बता कर उसे रोकना शुरू कर दिया।

Author नई दिल्ली | September 26, 2016 02:23 am
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (फाइल फोटो)

दिल्ली सरकार के अधिकारों को लेकर चार अगस्त को आए हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चाहे जो फैसला दे, लेकिन इतना तय है कि जो अधिकार पहले दिल्ली सरकार के पास थे, उसे भी आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार ने झगड़े में गंवा दिए। राजधानी में विधानसभा ही नहीं, बल्कि सरकार भी नियमों से अधिक परंपराओं पर चलती थी, लेकिन केजरीवाल सरकार ने बेवजह झगड़ामोल लेकर वो सारे अधिकार भी गंवा दिए जो दिल्ली की चुनी हुई सरकार को यूं ही मिले हुए थे।

हाई कोर्ट के फैसले के बाद तो उपराज्यपाल ने हर फैसले को नियम-कानून के खिलाफ बता कर उसे रोकना शुरू कर दिया। मौजूदा अधिकारों के साथ लगातार 15 साल तक मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित कहती हैं कि लगता है कि सरकार की नीयत में खोट है, वरना उनके फैसलों में कभी भी राजनिवास आड़े नहीं आया। इन 15 सालों में छह साल तक केंद्र में भाजपा की अगुआई वाली राजग की सरकार थी। कई मौके ऐसे आए जब उपराज्यपाल उनके फैसलों से सहमत नहीं थे, लेकिन तब उनसे बातचीत करके मुद्दा सुलझा लिया गया। दिल्ली विद्युत विनिमायक आयोग (डीईआरसी) के कई अध्यक्ष बनाए गए, लेकिन उपराज्यपाल ने कभी दखल नहीं दिया।

संविधान के जानकार और दिल्ली विधानसभा के शुरुआती दिनों में कई वर्षों तक सचिव रहे एसके शर्मा का कहना है कि इस विवाद से दिल्ली सरकार को कुछ हासिल नहीं होगा। 1991 में 69वें संविधान संशोधन के जरिए दिल्ली को सीमित अधिकारों वाली विधानसभा मिली। इस बारे में भारत के संविधान (अनुच्छेद 239 एए और अनुच्छेद 239एबी) में जो कहा गया है उसका विस्तार संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र शासन अधिनियम,1991 में किया गया है। उसी के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा पारित कामकाज की नियमावली (ट्रांजेक्शन आफ बिजनेस रूल्स) और कार्य आबंटन नियम बना है और विधानसभा के कामकाज में विधानसभा द्वारा पारित नियमावली बनाई गई। इन्हीं के आधार पर दिल्ली का शासन चलता है। इनमें पहले दो की ही व्याख्या हाई कोर्ट ने की और सुप्रीम कोर्ट भी वही करेगा।

इस सवाल का जवाब अदालतों के पास नहीं है कि अगर दिल्ली को विधानसभा दी गई तो उसे पूरे अधिकार क्यों नहीं दिए गए। 1998 में मुख्यमंत्री बनीं शीला दीक्षित तब के मुख्य सचिव ओमेश सहगल के बजाए पीएस भटनागर को मुख्य सचिव बनाना चाहती थी। केंद्र में भाजपा की अगुवाई वाली सरकार थी और भाजपा नेता सहगल की पैरवी कर रहे थे, लेकिन मुख्यमंत्री के अनुकूल मुख्य सचिव बनाने के तर्क के आधार पर तत्कालीन उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने भटनागर को मुख्य सचिव बनाया। वहीं आम आदमी पार्टी की सरकार में दोनों बार (2013 और 2015 में) मुख्य सचिव केजरीवाल के हिसाब से बनाए गए। इससे पहले दिल्ली में चाहे जो उपराज्यपाल रहा हो, उसने नियमों से परे जाकर दिल्ली की चुनी हुई सरकार को उसके हिसाब से काम करने दिया। तकनीकी विवाद पर केंद्र ने उपराज्यपाल का साथ दिया।

2002 में तत्कालीन उपराज्यपाल विजय कपूर और शीला दीक्षित के विवाद में गृह मंत्रालय ने एक परिपत्र जारी करके बिलों को पेश करने से पहले केंद्र सरकार से अनुमति लेने के आदेश दिए। इसके बावजूद कभी लगा ही नहीं कि दिल्ली सरकार के हर फैसले पर विवाद हो रहा है। नियमों की बात की जाए तो उपराज्यपाल की सहमति के बिना न तो पहले दिल्ली सरकार कोई फैसला ले सकती थी और न ही हाई कोर्ट के फैसले के बाद ले सकती है। यह उसी तरह है जैसे विधानसभा की ज्यादातर कारवाई बिना लिखे परंपरा के हिसाब से चलती है।

 

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