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सुख-सुविधा की चाह में पीछे छूटी सादगी, वेतन में बढ़ोतरी को लेकर ‘आप’ विधायक लामबंद

दिल्ली को भले ही पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल पाया हो लेकिन अपने विधायकों को सुख सुविधा देने में यह शुरू से ही अव्वल है। बावजूद इसके आप के विधायक अपने वेतन भत्ते में बढ़ोतरी...

Author July 12, 2015 11:08 AM
आप के विधायक अपने वेतन भत्ते में बढ़ोतरी के साथ-साथ दिल्ली के विभिन्न इलाकों में दफ्तर दिलाने की मांग कर रहे हैं।

दिल्ली को भले ही पूर्ण राज्य का दर्जा नहीं मिल पाया हो लेकिन अपने विधायकों को सुख सुविधा देने में यह शुरू से ही अव्वल है। बावजूद इसके आप के विधायक अपने वेतन भत्ते में बढ़ोतरी के साथ-साथ दिल्ली के विभिन्न इलाकों में दफ्तर दिलाने की मांग कर रहे हैं।

विधायकों को किराए के दफ्तर लेने और उसका भुगतान सरकार से करवाने पर लगभग सहमति सी बन गई है। किराए का सरकार की ओर से भुगतान करवाना तो सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए वह चाहे तो इसे कर ही सकती है। वेतन आदि बढ़ाने के लिए विधानसभा में विधेयक ला कर उसकी राष्ट्रपति से मंजूरी लेनी होगी। आप के विधायकों की मांग का अभी भाजपा और कांग्रेस विरोध कर रही है।

दिल्ली में आखिरी बार एक नवंबर 2011 को विधायकों के वेतन आदि में संशोधन करके उसे करीब एर लाख रुपए किया गया था। तब अक्षरधाम मंदिर के पास बने राष्ट्रमंडल खेल गांव में विधायकों के लिए हॉस्टल बनाने की मांग की गई थी लेकिन वह सिरे नहीं चढ़ पाई। विधायकों के लिए दिल्ली सचिवालय या नई दिल्ली इलाके में हॉस्टल बनवाने की बात आम लोगों को इसलिए भी हजम नहीं हुई कि सिविल लाइंस इलाके में दिल्ली सरकार के मंत्रियों के लिए बनी अनेक कोठियां पूरे कांग्रेस राज में खाली ही रही।

दिल्ली सरकार में लगातार 15 साल मंत्री रहे डा. अशोक कुमार वालिया थोड़े समय के लिए राउज एवन्यू की कोठी में रहे और थोड़े ही समय दरिया गंज की कोठी अपने पास रखा अन्यथा वे ज्यादातर समय अपने घर से ही काम करते रहे। दूसरे मंत्री राजकुमार चौहान, योगानंद शास्त्री ने तो कभी कोठी ली ही नहीं। मंगत राम सिंघल, विधानसभा अध्यक्ष चौ. प्रेम सिंह तो केवल लोगों से मिलने जुलने के लिए कोठी ली, वे रहते अपने घर पर ही थे।

अरविंदर सिंह लवली या हारून यूसुफ का घर भीड़ वाले इलाके में था इसलिए घर के बजाए सरकारी कोठी में रहे। वीआइपी कल्चर कह कर कोठी का विरोध करने वाले आप के मुख्यमंत्री समेत कई मंत्री कोठी में रहने लगे हैं। जो बच गए हैं उनके लिए भी इंतजाम किया जा रहा है।

2011 में वेतन भत्ते में संशोधन के बाद सभी विधायक को 54 हजार रुपए वेतन, घर पर दो डाटा इंट्री आॅपरेटर रखने के लिए हर महीने तीस हजार रुपए, दिल्ली सरकार के सामान्य प्रशासन विभाग की ओर से कंप्यूटर के लिए एक लाख रुपए का अनुदान मिलता है जिसके बदले उन्हें पांच साल बाद पांच हजार रुपए या पुराना लैपटॉप (कंप्यूटर) लौटाना होगा। बिजली पानी बिल के लिए हर महीने चार हजार रुपए, हर बैठक (विधान सभा या कमेटी) के लिए एक हजार रुपए भत्ता, हर साल अपनी पत्नी या सहयोगी के साथ 50 हजार रुपए तक यात्रा खर्च और न्यूनतम ब्याज पर कार खरीदने के लिए चार लाख रुपए कर्ज शामिल है।

विधायक न रहने पर उन्हें पेंशन साढ़े सात हजार रुपए और जितने साल विधायक रहे उतने हजार रुपए बतौर पेंशन दिए जाने का प्रावधान है। दिल्ली विधानसभा के एक पूर्व सचिव बताते हैं कि इससे ज्यादा पैसे तो विधायकों को केवल कर्नाटक में ही मिलते हैं। यह सारी सुविधाएं तो सामान्य विधायकों के लिए हैं लेकिन इस सरकार में तो शायद 70 में से दर्जन भर कोई विधायक ही बच गए हैं जिनको सरकारी गाड़ी और दफ्तर आदि नहीं मिला है।

मुख्यमंत्री समेत सात मंत्री, 21 संसदीय सचिव, जिला समितियों के अध्यक्ष, विभिन्न बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों को गाड़ी और दफ्तर मिल गया है। ऐसे में इलाके की जनता से मिलने के लिए अलग दफ्तर के अलावा वेतन-भत्ते को बढ़ाने पर दिल्ली सरकार गंभीरता से विचार कर रही है। भाजपा विधायक विजेंद्र गुप्ता को विपक्ष के नेता के नाते मंत्री स्तर की सारी सुविधाएं मिलनी हैं। उन्हें अब तक नहीं मिली है। उनका आरोप है कि सरकार में उनकी कोई सुन ही नहीं रहा है।

(मनोज मिश्र)

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