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आम आदमी पार्टी: इस बार का माफीनामा शायद ही हो मंजूर

रामलीला मैदान में शपथ लेते समय उन्होंने दिल्ली से बाहर न जाने की घोषणा की और देश भर में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली की जनता से माफी मांगी। लेकिन दूसरे ही दिन से पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी।

Author नई दिल्ली  | April 30, 2017 1:39 AM
दिल्‍ली के मुख्‍यमंत्री अरविंद केजरीवाल। (फाइल फोटो)

वयोवृद्ध सामाजिक कार्यकर्ता अण्णा हजारे व अरविंद केजरीवाल की अगुआई में ‘इंडिया अंगेस्ट करप्शन मूवमेंट’ के बाद 2012 के अंत में आप के गठन के बाद से केजरीवाल बार-बार अपने बयान को बदलने का अनोखा रेकार्ड बना चुके हैं। 2013 के विधान सभा चुनाव में उनकी पार्टी को 28 सीटें मिली। किसी को न समर्थन देने और किसी का समर्थन न लेने के वादे से उलट उन्होंने कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई और 49 दिन में सरकार छोड़ कर चले गए। अपने इस्तीफे पर उन्होंने माफी मांग कर 2014 का लोकसभा चुनाव लड़ा। देश भर में भारी पराजय के बाद आप में भारी कलह मचा। उनका आरोप था कि योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण आदि के दबाव में वे दिल्ली छोड़ कर देश भर में चुनाव लड़ने लगे। उन नेताओं से लड़ाई का अंत 2015 में दिल्ली की सत्ता मिलने के बाद उन्हें पार्टी से बाहर करने के बाद हुआ। जिस केजरीवाल को लोकसभा चुनाव की हार के बाद बगावत रोकने के लिए बेवजह जेल जानी पड़ी, उन्हीं को दिल्ली की जनता ने 70 में से 67 सीटें दे दी। रामलीला मैदान में शपथ लेते समय उन्होंने दिल्ली से बाहर न जाने की घोषणा की और देश भर में लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए दिल्ली की जनता से माफी मांगी। लेकिन दूसरे ही दिन से पंजाब विधानसभा चुनाव की तैयारी शुरू कर दी।

विरोध करने या पूरी तरह से हां में हां न मिलाने वालों को पार्टी से बाहर करने का सिलसिला जीत के गरूर में चलता रहा। एक के बाद एक करके दिल्ली, पंजाब और देश के दूसरे हिस्से के नेता आप से अलग होते गए। केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के पुराने साथी कुमार विश्वास पिछले काफी दिनों से पार्टी में अलग-थलग हो गए थे। पंजाब चुनाव के बाद वे इशारों में बोले लेकिन अब निगम चुनाव के बाद तो वे खुलकर बोलने लगे हैं। वे सारी बातें उसी तरह से कहने लगे हैं जिस तरह से प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और आनंद कुमार दो साल पहले कह रहे थे। उन्हें केजरीवाल ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। अब केवल कुमार विश्वास ही नहीं पंजाब के सांसद भगवंत मान आदि भी कहने लगे कि हार ईवीएम की वजह से नहीं, जनता से कट जाने के चलते हुई है।निगम चुनाव नतीजों से पहले जो केजरीवाल निगम में हार पर ईंट से ईंट बजाने की घोषणा करते थे और दिल्ली के उपराज्यपाल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ दिन भर आरोप लगाने के बाद चुनाव आयोग जैसा संवैधानिक संस्था पर मर्यादाहीन आरोप लगाते थे, वही केजरीवाल हालात को भांप कर एक बार फिर दिल्ली के लोगों से माफी मांग कर नए सिरे से लोगों से जुड़ने की बात कह रहे हैं। आम जनता के बीच रहने वाली पार्टी दिल्ली की सत्ता में आने के बाद लोगों से दूर होती चली गई थी। अभी भी उसके नेता लोगों से सीधा संवाद करने के बजाय ट्विटर पर ही संवाद कर रहे हैं। दो साल में पार्टी ने सरकारी आयोजनों और इस नगर निगम चुनाव के लिए सभा करने के अलावा आम लोगों के बीच एक भी बड़ा कार्यक्रम नहीं किया है। जिन मुद्दों को आप नेता कुमार विश्वास ने उठाया है उसमें एक मुद्दा तो यही है कि केजरीवाल और उनका अनुसरण करते हुए पार्टी के नेताओं ने देश की कई संवैधानिक संस्थाओं पर बेवजह हमले किए, पाकिस्तान में घुस कर किए गए लक्षित हमले के लिए सबूत मांगा और देशविरोधी आंदोलन करने वालों का पार्टी ने पक्ष लिया। साथ ही जो वादे किए गए थे, वे भी पूरे नहीं हुए।

जिस तरह से 2014 के लोकसभा चुनाव की हार के बाद वे खुद बिखरने लगे और अचानक दोबारा सफलता मिलने पर विरोध करने वालों को पार्टी से बाहर करते गए, उससे उनकी राजनीतिक परिपक्वता पर सवाल उठ रहा है। साथ ही, संसदीय सचिव बनाए गए आप के 21 विधायकों की सदस्यता पर आने वाले दिनों में फैसला आने वाला है। कई विधायक पहले से ही बागी बने हुए हैं। अगले साल इन विधायकों के बूते तीन राज्यसभा के सदस्यों के चुनाव होने वाले हैं। ऐसे में केजरीवाल ने एक बार फिर गलतियों के लिए माफी मांग ली और सुधार के लिए सभी का साथ मांगा है। वैसे इस बार उनकी राह इसलिए कठिन है कि दो साल की सरकार ने उनकी दूरी अपनों से भी बढ़ा दी है, आम जन तो दूर हो ही गए हैं। कहा जा रहा है कि अगर आप के उम्मीदवार सामर्थ्यवान न होते तो वोटों का औसत 26 फीसद से भी कम हो जाता। दो साल में आप के वोट 54 से घट कर 26 फीसद पर आ जाना केजरीवाल के लिए बड़े सदमे से कम नहीं है। इसे वापस 54 फीसद पर लाना आसान काम नहीं है।

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