गठबंधन के चक्कर में अनिश्चितता में फंसी दिल्ली की राजनीति

दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) में गठबंधन पर मुहर नहीं लगने से दिल्ली का राजनीतिक माहौल साफ नहीं हो रहा है। हर दूसरे दिन किसी न किसी स्तर से यह खबर आ जाती है कि गठबंधन की संभावना खत्म नहीं हुई है।

दिल्ली की पूर्व सीएम शीला दीक्षित और सीएम अरविंद केजरीवाल।

दिल्ली की सात लोकसभा सीटों पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी (आप) में गठबंधन पर मुहर नहीं लगने से दिल्ली का राजनीतिक माहौल साफ नहीं हो रहा है। हर दूसरे दिन किसी न किसी स्तर से यह खबर आ जाती है कि गठबंधन की संभावना खत्म नहीं हुई है। दस जनवरी को प्रदेश अध्यक्ष बनीं शीला दीक्षित भी अपने पूर्ववर्ती अध्यक्ष अजय माकन की तरह बार-बार समझौते से इनकार कर रही हैं, लेकिन साथ ही यह कहकर वह गठबंधन की अटकलों को हवा दे देती हैं कि फैसला आलाकमान करेगा। ‘आप’ के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल सभी सात सीटों पर चुनाव प्रचार भी शुरू कर चुके हैं। उन्होंने सभी सीटों के प्रभारी भी काफी पहले ही घोषित कर दिए थे, जिन्हें पार्टी का उम्मीदवार माना जा रहा है। दिल्ली की सातों सीटों पर भाजपा के सांसद हैं और उसने फिलहाल दोनों दलों के फैसले के इंतजार में उम्मीदवार तय करने की प्रक्रिया धीमी कर रखी है। वैसे माना यही जा रहा है कि ‘आप’ और कांग्रेस में तालमेल नहीं होने पर भी सात में से तीन के टिकट कट सकते हैं और अगर तालमेल हो गया तो भाजपा को अपनी रणनीति में ज्यादा बदलाव करना पड़ेगा।

सितंबर में अजय माकन के प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा देने के बाद पार्टी को उनका उत्तराधिकारी तय करने में महीनों लग गए। 10 जनवरी को शीला दीक्षित को प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया और उनके साथ तीन कार्यकारी अध्यक्ष भी बनाए गए। कहा यही गया कि 80 की उम्र पार कर चुकीं शीला दीक्षित का चेहरा सामने रहेगा, लेकिन काम तीनों कार्यकारी अध्यक्ष करेंगे। हालांकि शीला की ताजपोशी के एक महीने के बाद भी पार्टी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। कांग्रेस के पास मुख्य रूप से दलित, अल्पसंख्यक, कमजोर वर्ग, पूर्वांचल के प्रवासी (बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश के मूल निवासी) व दिल्ली देहात को लोगों का समर्थन था। उन्हीं के बूते वह सालों तक दिल्ली पर राज करती रही। लेकिन अब इन सभी वर्गों में कांग्रेस से ज्यादा पैठ ‘आप’ की हो गई है। माना जाता है कि अल्पसंख्यक वर्ग उसी दल के साथ जाएगा जो भाजपा को हराता दिखे।

एक तरफ ‘आप’ के नेता कांग्रेस से तालमेल पर बयान देते रहते हैं, दूसरी तरफ मुख्यमंत्री केजरीवाल कांग्रेस को वोटकटवा साबित करने में जुटे हैं। उन्होंने खुलेआम कहना शुरू कर दिया है कि भाजपा को हराने के लिए ‘आप’ को वोट दें। वहीं कांग्रेस उम्मीदवार तय करने की कवायद शुरू करने को फिलहाल तैयार नहीं है। कहा जा रहा है कि पार्टी दो चुनाव हारने वालों को टिकट नहीं देगी। अगर यह पैमाना लागू होता है तो दिल्ली में कांग्रेस को ढंग के उम्मीदवार ही नहीं मिलेंगे। पिछले दो विधानसभा चुनाव और लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के ज्यादातर उम्मीदवार चुनाव हार गए थे। वहीं कांग्रेस और ‘आप’ में तालमेल पर आखिरी फैसला नहीं होने से भाजपा की भी तैयारी भी रफ्तार नहीं पकड़ पा रही है। पार्टी तय ही नहीं कर पा रही है कि मौजूदा प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार होंगे या फिर से अपनी पुरानी सीट से चुनाव लड़ेंगे। दिल्ली की सात सीटों के सांसदों को फिर से चुनाव लड़ाया जाए या नहीं, इसके लिए पार्टी ने कई सर्वे करवाए और केंद्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण को दिल्ली का विशेष प्रभारी बनाया। फिलहाल यह देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी पहले सातों लोकसभा सीटों के उम्मीदवार तय करती है या विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार।

Next Stories
1 पूर्वी दिल्ली को जाम से बचाएंगे दो नए फ्लाईओवर
2 किताब में ‘फाइल को 10 जनपथ भेजने’ का था उल्‍लेख, बुक लॉन्‍च से किनारा कर गए मनमोहन सिंह
3 नीतीश के बाद उद्धव भी देंगे बीजेपी को झटका, राज्यसभा में नागरिकता बिल का विरोध करेगी शिवसेना
यह पढ़ा क्या?
X