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उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा के लिए बढ़ाई चुनौती!

निगम उप चुनाव ने साफ कर दिया है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इस बार निगम में कब्जा बनाए रखने के लिए बड़े दंगल में उतरना होगा।

MCDसांकेतिक फोटो।

निगम उप चुनाव ने साफ कर दिया है कि भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को इस बार निगम में कब्जा बनाए रखने के लिए बड़े दंगल में उतरना होगा। अब तक की चुनावी रणनीति में भाजपा बहुमत प्राप्त करती आ रही है और इसके लिए जो भी रणनीति भाजपा ने अपनाई है इसका लाभ भी भाजपा को हुआ है। लेकिन उप चुनाव में पांच सीट में से भाजपा को एक भी सीट नहीं मिली है। जबकि आम आदमी पार्टी (आप) ने अपनी चारों सीटों पर कब्जा बकरार रखा है और कांग्रेस ने एक सीट निकाल कर वापसी के संकेत दिए हैं।

इस बार के उप चुनाव को आम आदमी पार्टी पहले से ही आने वाले 2022 के मुख्य निगम चुनाव का शो केस पेश करके आगे बढ़ रही थी। आप पार्टी ने दावा किया था कि इस बार के चुनाव में अगर इन सीटों पर पार्टी की वापसी होती है तो इसका सीधा लाभ जनता को ही होगा। माना जा रहा है कि लोगों ने टकराव की राजनीति को छोड़कर एक ही पार्टी वाली सरकार को समर्थन दिया। इसी तर्ज पर पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के कार्यकाल में कांग्रेस एक छत्र राज्य कर चुकी है। इसका लाभ जनता को समझ आया है कि अगर एक पार्टी की सरकार होगी तो इससे विवादों में आम जनता के काम नहीं फंसेंगे।

वैसे इस उप चुनाव की घोषणा से पहले ही कई सवाल उठ रहे थे। क्योंकि एक साल के बाद ही पार्टी को मुख्य चुनाव में जाना है। इसलिए पार्टी में दबी आवाज में यह बात भी सामने आ रही थी कि पार्टी को सीधे मुख्य चुनाव की ओर जाना चाहिए। इस तथ्य को भी पार्टी में नजरअंदाज किया गया है, अब इस शंका को भी सही माना जा रहा है। हालांकि अब तर्क यह पेश हो रहा है कि चारों सीट पर पहले से ही आम आदमी पार्टी का कब्जा था। इस स्थिति में जहां एक सीट से भाजपा को हाथ गवांना पड़ा हैं, वहीं पर आप से कांगे्रस ने एक सीट को छीन लिया है।

इस पूरे उप चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने आम आदमी पार्टी की विरोध की नीति को जनता के सामने पेश किया है। इसमें पार्टी की कोशिश यह समझाने की रही है कि दिल्ली में आप का शासन होने के कारण केंद्र सरकार की योजनाओं का लाभ आम जनता तक नहीं पहुंच पा रहा है। यह मूल मंत्र इस उप चुनाव में बड़ा हथियार नहीं बन पाया है। पार्टी के सूत्र बताते हैं कि इस चुनाव से पहले ही हुई कई बैठकों में कई बार पार्टी के नेताओं ने भी कामकाज को लेकर बड़ी नाराजगियां सामने रखी थीं क्योंकि पार्टी नेताओं का मानना था कि निगम में सत्ता होने के बाद भी कई मोर्चे खाली रहे हैं।

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