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वर्ग-भेद के मंच पर एक प्रेमकथा

सामाजिक, राजनीतिक द्वंद्व के साथ जब दो दिलों के जज्जबात मंच पर टकराते हैं तो प्रोफेसर सुरेश भारजद्वाज की प्रकाश परिकल्पना उन भावों का अलग-अलग अस्तित्व उभारती है।

Author नई दिल्ली | March 19, 2017 3:54 AM
एक समाज में वह प्रयोग का हिस्सा भर है और अपने मूल समाज में उसकी पहचान खो सी गई है।

आज चाहे इसकी गूंज दबाने की कोशिश हो रही हो। लेकिन वर्ग-भेद एक शास्वत वैश्विक सच है। प्याज के छिलके की तरह इसकी कई परतें हैं। मूल में जो आर्थिक है वह भौगोलिक, नस्लीय, मजहब, जातिगत के साथ जुबान की परतों में भी दिखता है। आपकी मातृभाषा भी आपका वर्ग तय करती है। जुबान की टकराहट, संस्कृतियों की टकराहट है, वर्ग की टकराहट है। और यह टकराहट दिखी राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के अभिमंच प्रेक्षागृह में। जॉर्ज बर्नाड शॉ की रचना ‘पिगमेलियन’ का मराठी रूपांतर पीएल देशपांडे ने ‘ती फूलराणी’ के नाम से किया। ‘पिगमेलियिन’ का मंचन 1913 में पहली बार हुआ था, जिसने क्लासिक रचना का तमगा भी हासिल किया। वर्ग-विभेद में गुंथी इस प्रेमकथा का एनसीडी के निदेशक वामन केंद्रे ने ‘लागी लगन’ के नाम से मंचन किया। बीड़ से रोजी-रोटी कमाने के लिए मुंबई आई फूल बेचने वाली लड़की मंजुला की जुबान उच्चारण शास्त्र (फोनेटिक्स) के प्रोफेसर विक्रम इनामदार से जा टकराती है।

प्रोफेसर साहब को उच्चारण पर अनुसंधान के लिए एक ‘आॅब्जैक्ट’ की तलाश है। उनका साथी डॉक्टर विश्वनाथ भी इस प्रयोग में उसके साथ है। विक्रम, विश्वनाथ से शर्त लगाता है कि वह छह महीने के भीतर मंजुला के उच्चारण में सुधार ला देगा। प्रोफेसर साहब के प्रयोग के साथ मंजुला के सपना देखने का भी सिलसिला शुरू हो जाता है। अब वह चाहती है कि वह ‘अच्छी भाषा’ मतलब प्रोफेसरों जैसी भाषा सीखकर फ्लोरिस्ट की दुकान खोलेगी। सिखाने और सीखने के क्रम में मंजुला और प्रोफेसर के बीच प्रेम की कोपलें भी फूटती हैं। लेकिन उनकी भाषागत पहचान तो उनके बीच एक सामाजिक दूरी भी तय करती है इसलिए यह प्रेम मुखर नहीं हो पाता है, भाषा में इजहार नहीं कर पाता है।दोनों के प्रेम का तो इजहार नहीं हो पाता है, लेकिन प्रोफेसर का प्रयोग सफल होता है। ‘अंतरराष्ट्रीय स्पीच कॉन्फ्रेंस’ में मंजुला समाज के ऊपरी वर्ग वाली भाषा में दक्षता के साथ अपना भाषण देती है और यह सब होता है छह महीने के भीतर। विक्रम अपनी शर्त जीत जाता है।

लेकिन प्रोफेसर की जीत के साथ ही शुरू होता है मंजुला का नया संघर्ष। कल तक बीड़ की शोख, देसी लड़की आज आभिजात्य जुबान बोल रही है, नए वर्ग में घुसपैठ उसे उसकी जड़ों से अलग कर रही है। आज वह मझधार पर खड़ी है। एक समाज में वह प्रयोग का हिस्सा भर है और अपने मूल समाज में उसकी पहचान खो सी गई है। लेकिन विक्रम का मकसद तो हाशिए पर खड़े वर्ग का उत्थान था। तो क्या अपने प्रयोग और महत्त्वाकांक्षा में उसने मंजुला को एक नई पहचान दी या फिर उसकी मूल पहचान छीन ली? प्रेम, संस्कृति और स्त्री-पुरुष के रागात्मक संबंधों की पड़ताल करते हुए इस नाटक में हाशिए के लोगों की पहचान के सवाल को भी बहुत संवेदनशील तरीके से उठाया गया है। फूल बेचती लड़की और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में भाषण देती लड़की खुद की पहचान से टकराती है। जॉर्ज बर्नाड शॉ सामाजिक और राजनीतिक विडंबनाओं पर जिस तरह से चोट करते हैं, अपने निर्देशकीय कौशल से वामन केंद्रे उसे उसी तरह मंचित करते हैं। वर्ग-भेद की थीम पर जिस तरह वह प्रेमकथा को उतारते हैं वह उनकी एक खास शैली है।

वामन केंद्रे कहते हैं, ‘वर्ग-भेद एक ऐसा विषय है जो सदियों से हमारे सामाजिक तंत्र का अभिन्न हिस्सा रहा है और शायद आने वाले समय में भी अपना अस्तित्व बनाए रहेगा’। सामाजिक, राजनीतिक द्वंद्व के साथ जब दो दिलों के जज्जबात मंच पर टकराते हैं तो प्रोफेसर सुरेश भारजद्वाज की प्रकाश परिकल्पना उन भावों का अलग-अलग अस्तित्व उभारती है। मंच पर उनकी बिखेरी रोशनी ‘लागी लगन’ को एक परिपक्व आभा में ढालती है। नृत्य संरचना अनिल अरहर सुतार की है। कलाकारों की पोशाक का वर्ग-विभेद संध्या गंगाधर की वस्त्र परिकल्पना में स्पष्ट रूप से दिखता है। मंच सज्जा नाविद की है। मंजुला के रूप में बर्नाली बोरा का चेहरा और जुबान वर्गीय-विभेद की पहचानों के साथ बखूबी टकराते हैं। विक्रम के रूप में यतेंद्र बहुगुणा और विश्वनाथ के रूप में दीप कुमार अपने अभिनय की छाप छोड़ते हैं।

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