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संगीतः देवाशीष डे के सुरीले गायन की संध्या

संस्कृति प्रतिष्ठान अपने अन्य संस्कृतिपरक अनुष्ठानों के अतिरिक्त प्रतिभाशाली कलाकारों को छात्रवृत्ति और फेलोशिप प्रदान कर उनके प्रोत्साहन और प्रश्रय के लिए भी जाना जाता है।

Author नई दिल्ली | March 7, 2016 01:19 am
देवाशीष डे

संस्कृति प्रतिष्ठान अपने अन्य संस्कृतिपरक अनुष्ठानों के अतिरिक्त प्रतिभाशाली कलाकारों को छात्रवृत्ति और फेलोशिप प्रदान कर उनके प्रोत्साहन और प्रश्रय के लिए भी जाना जाता है। इस नेक काम में अक्सर कलाप्रेमी रसिक भी उनके साथ जुड़ जाते हैं। संस्कृति प्रतिष्ठान के साथ मिलकर श्रीमती पूरोबी मुखर्जी ने अपने गुरु की स्मृति में पं वसंत ठकार मेमोरियल फेलोशिप की स्थापना की है। इस बार यह फेलोशिप पाने वाले बनारस के युवा गायक देवाशीष डे के शास्त्रीय गायन का कार्यक्रम संस्कृति प्रतिष्ठान ने इंडिया इंटरनेशनल के साथ मिलकर सेंटर सभागार में आयोजित किया।

देवाशीष डे ने प्रयाग संगीत समिति से संगीत प्रवीण करने के अलावा पं पशुपतिनाथ मिश्र और पं मुकुंद विष्णु कालविंत के शिष्यत्व में खयाल और ठुमरी सीखी है। देवाशीष ने खयाल और ठुमरी दोनों की ही विधिवत तालीम पाई है। यद्यपि दिल्ली के संगीतप्रेमियों ने इससे पहले उनका ठुमरी गायन तो सुना था लेकिन पूरी शाम एकल कलाकार के तौर पर संभवत: वह पहली बार अपना शास्त्रीय गायन प्रस्तुत कर रहे थे।
संस्कृति प्रतिष्ठान के सुरुचिपूर्ण सज्जा वाले मंच को आध्यात्मिक सुवास दी एकदम सुर में मिले तानपुरों की जोड़ी के सुरीले निनाद ने और राग झिंझोटी का माहौल बनाया रोहन नायडू की वायलिन के संवेदनशील स्पर्श ने।

देवाशीष ने झिंझोटी के आलाप में सजाकर गजानन स्तुति से मंगलमयी शुरुआत की और इस राग का अत्यधिक लोकप्रिय बड़ा खयाल ‘सांवरो मन भायो’ विलंबित ताल में शुरू किया। बड़े खयाल की बंदिश के बोलों का इतना स्पष्ट उच्चारण और एक-एक शब्द के भाव उजागर करती प्रस्तुति सुनना एक विरल सुख था। स्थाई अंतरा भरने के बाद सरगम के साथ मीठी वायलिन साथ-साथ चली। क्रमश: सरगम और आकार की तानों के बाद उन्होंने रातञ्जंकर की ही रची अत्यधिक लोकप्रिय मध्य लय की बंदिश ‘कुटी जो हती अब बैन भई’ तीनताल के अद्धे ठेके में और ‘मेरो मन हर लीनो संवरिया’ ने द्रुत तीनताल में पेश करके सामान्य संगीत प्रेमियों को तो मोह लिया लेकिन सुधी श्रोताओं को किंचित निराश भी किया।

देवाशीष एक भावुक गायक हैं अत: खयाल को रागदारी से असरदार बनाने की जगह बंदिश के बोलों को भावनात्मक रूप से उद्दीप्त करने की ओर उनका ध्यान अधिक दिखाई दिया। ऐसा लगा कि खूबसूरती उन्हें प्रिय है वह चाहे जैसे भी हासिल हो, यही कारण था कि काकुवैचित्र्य और पुकार जैसी नाटकीयता के अलावा भी कहीं तो वह सही और खुली आवाज से गाते और कहीं फालसेटो की सीमा तक भावविभोर करने की कोशिश में उलझ जाते। शायद बोलों को सजाने संवारने की आदत उन्हें ठुमरी गायन से मिली हो लेकिन खयाल की अपेक्षाएं एकदम अलग होती हैं। इसका उन्हें ध्यान रखना चाहिए।

देवाशीष का हारमोनियम पर साथ देने के लिए विनय मिश्र और तबले पर किशोर मिश्र जैसे मंजे हुए संगतकार थे। लेकिन मुख्य राग के बाद उन्होंने अपनी रची रागमाला गाई जिसके शब्दों में वे राग गूंधे गए थे जिनकी वह माला थी मसलन ‘ये मन बैरागी कहे गोरखनाथ’ मुखड़े को यमन बैरागी और गोरखकल्याण में गाया।

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