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मुंबई में लेप्टोस्पायरोसिस नाम की बीमारी से गई चार लोगों की जान, बाढ़ के पानी और चूहों से बचने की जरूरत

मुंबई में 17 साल के एक किशोर सहित चार लोगों की लेप्टोस्पायरोसिस से हुई मौत ने संकेत दे दिया है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में इस बीमारी के फैलने का खतरा काफी ज्यादा है।

Author नई दिल्ली, 22 जुलाई। | July 23, 2018 12:11 PM
इस बीमारी का इलाज रोगी के चिकित्सकीय इतिहास और शारीरिक परीक्षा के आधार पर किया जाता है।

मुंबई में 17 साल के एक किशोर सहित चार लोगों की लेप्टोस्पायरोसिस से हुई मौत ने संकेत दे दिया है कि बाढ़ प्रभावित इलाकों में इस बीमारी के फैलने का खतरा काफी ज्यादा है। विशेषज्ञों का कहना है कि बारिश के मौसम में सफाई और स्वच्छता सहित पर्याप्त सावधानी बरतने की जरूरत है। उन्होंने बताया कि लेप्टोस्पायरोसिस एक जीवाणु रोग है, जोकि इंसानों, चूहों और पालतू जानवरों को प्रभावित करता है। यह उनके मल-मूत्र से फैलता है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारी बारिश के बाद निचले इलाकों पर अधिक ध्यान दिए जाने की जरूरत होती है क्योंकि वहां पानी जल्दी भरता है और बाढ़ की समस्या भी ज्यादा रहती है। मनुष्यों और जानवरों को प्रभावित करने वाली यह बीमारी लेप्टोस्पायल नाम के बैक्टीरिया के कारण होती है। यह संक्रमित जानवरों के मूत्र के जरिए फैलता है। इसके बैक्टीरिया पानी या मिट्टी में रहते हुए कई हफ्तों से लेकर महीनों तक जीवित रह सकते हैं।

बीमारी के बारे में बताते हुए हार्ट केयर फाउंडेशन ऑफ इंडिया (एचसीएफआइ) के अध्यक्ष डॉ केके अग्रवाल ने कहा कि अत्यधिक बारिश और उसके बाद आई बाढ़ से चूहों की संख्या में बढ़ोतरी हो जाती है। चूहों के कारण जीवाणुओं का फैलाव आसान हो जाता है। संक्रमित चूहों के मूत्र में बड़ी मात्रा में लेप्टोस्पायल होते हैं, जो बाढ़ के पानी में मिल जाते हैं। ये जीवाणु त्वचा या (आंख, नाक या मुंह की) श्लेष्मा झिल्ली के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर सकते हैं, खासकर अगर कहीं त्वचा कटी हो तो। दूषित पानी पीने से भी इसका संक्रमण हो सकता है। इलाज के अभाव में लेप्टोस्पायरोसिस से गुर्दे की बीमारी, मेनिंजाइटिस (मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के चारों ओर झिल्ली की सूजन), जिगर यानी लिवर की खराबी और सांस लेने में परेशानी भी पैदा कर सकता है और यहां तक कि यह मौत का कारण भी बन सकता है। बीमारी के संक्रमित स्रोत के संपर्क में आने और बीमार होने के बीच का समय दो दिन से चार हफ्ते तक का हो सकता है। यानी एक बार आप इस जीवाणु के संपर्क में आ गए तो दो दिन से चार हफ्ते के भीतर कभी भी बीमार पड़ सकते हैं।

डॉ अग्रवाल ने कहा कि इस बीमारी का इलाज रोगी के चिकित्सकीय इतिहास और शारीरिक परीक्षा के आधार पर किया जाता है। गंभीर लक्षणों वाले मरीजों को कुछ जरूरी जांच कराने को कहा जाता है। शुरुआती चरण में लेप्टोस्पायरोसिस का इलाज मुश्किल होता है क्योंकि इसके लक्षण फ्लू और दूसरे आम संक्रमणों जैसे ही मालूम होते हैं। लेप्टोस्पायरोसिस का इलाज डॉक्टर की ओर से निर्धारित खास एंटीबायोटिक्स के साथ किया जा सकता है।

बचाव के सुझाव

  • गंदे पानी में न घूमें।
  • खुले घावों को साफ करके ढक कर रखना चाहिए।
  • बंद जूते और मोजे पहन कर चलें।
  • मधुमेह से पीड़ित लोग खास सावधानी बरतें।
  • पैरों को अच्छी तरह से साफ करें और उन्हें मुलायम सूती तौलिए से सुखाएं।
  • पालतू जानवरों को जल्द से जल्द टीका लगवाएं क्योंकि वे संक्रमण के संभावित वाहक हो सकते हैं।

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