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प्रियरंजन की रिपोर्टः संघर्ष के गवाहों का खत्म होता निशां

पूरा देश इन दिनों आजादी की 69वीं सालगिरह मनाने में जुटा है। हर साल स्वतंत्रता के जश्न का साक्षी बनने वाला दिल्ली का लाल किला साल 1857 में हुई आजादी की पहली लड़ाई का भी गवाह रहा है।

Author नई दिल्ली | August 15, 2016 5:41 AM
कुतुबमीनार (Photo: Indian Express)

पूरा देश इन दिनों आजादी की 69वीं सालगिरह मनाने में जुटा है। हर साल स्वतंत्रता के जश्न का साक्षी बनने वाला दिल्ली का लाल किला साल 1857 में हुई आजादी की पहली लड़ाई का भी गवाह रहा है। 10 मई 1857 को शुरू हुई यह लड़ाई गुलामी के विरोध की पहली चिनगारी साबित हुई, जिसने 1947 तक अंग्रेजी साम्राज्य को खाक कर दिया, लेकिन दिल्ली का वह इलाका जहां यह लड़ाई लड़ी गई, हारी और फिर जीती गई, वह इन दिनों प्रेमी जोड़ों के सैर-सपाटे की जगह बन कर ही रह गया है। यहां की कई धरोहरें भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) की सूची में दर्ज भर ही हैं।

चौंकाने वाले तथ्य यह हैं कि ये धरोहरें देसी पर्यटकों की सूची में दोयम दर्जा भले ही पाती हों, लेकिन ब्रिटेन के सैलानियों की ‘दिल्ली दर्शन’ सूची में 1857 के विद्रोह से जुड़ी ये धरोहरें वरीयता में रहा करती हैं। इसकी पुष्टि इन धरोहरों की पहरेदारी करने वाले गार्ड भी करते हैं। ब्रिटिश नागरिकों के लिए 1857 के विद्रोह से जुड़ी ये धरोहरें केवल पर्यटन स्थल नहीं हैं बल्कि ‘राष्ट्रवाद’ की अनुभूति देने वाली धरोहरें हैं क्योंकि यही वे स्थल हैं जहां अगर 1857 में अंग्रेजों को शरण न मिलती तो ब्रिटिश साम्राज्य का सूरज कब का डूब चुका था!

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1857 में बहादुर शाह जफर की अगुआई में आजादी की जो लड़ाई दिल्ली में लड़ी गई, वो इलाका लाल किले से दिल्ली विश्वविद्यालय के बीच आता था। वह इलाका अब कमला नेहरू रिज पार्क के नाम से मौजूद है जहां की एक-एक धरोहर इस लड़ाई की कहानी बयां करती है। वहीं अफसोस की बात यह है कि कुछ धरोहरें गंदगी व अपेक्षा के चलते तो कुछ ‘लवर्स प्वाइंट’ के नाम से मशहूर होने के कारण आम लोगों से दूर होती जा रही हैं। इस इलाके में पे्रमी युगलों की भारी संख्या में मौजूदगी देखी जा सकती है। बहरहाल, इस कड़ी में लाल किले से कश्मीरी गेट की ओर बढ़ते हैं तो सबसे पहले गोला बारूद डिपो, फिर लोथियन कब्रगाह, उसके बाद कश्मीरी गेट और अंत में 87 हेक्टेयर में फैला रिज का इलाका आता है जिसमें चौबुर्जा, खूनी खान झील, सर्पाकार झील, फ्लैगस्टाफ टावर और अजीत गढ़ जैसे ऐतिहासिक धरोहर स्थल आते हैं जो इन दिनों ‘लवर्स प्वाइंट’ में बदल चुके हैं।

दिल्ली विश्वविद्यालय से सटे होने की वजह से यहां सैकड़ों की तादाद में प्रेमी युगल दिनभर डेरा डाले रहते हैं। हरा-भरा, शांत, एकांत और प्राकृतिक मनोरम दृश्यों वाला यह इलाका 70 से ज्यादा प्रजातियों के पक्षियों का प्रवास भी है। इतिहास बताता है कि 1857 के गदर में पहले अंग्रेज दिल्ली में हार गए थे। 10 मई 1857 को मेरठ से दिल्ली आने वाले विद्रोही यमुना पर बने नाव के पुल (अभी जहां लोहे का पुल है) से लाल किले में दाखिल हुए और पेंशनयाफ्ता बहादुर शाह जफर को सम्राट घोषित कर दिया। बल्लभगढ़ के राजा नाहर सिंह और झज्जर के नवाब ने विद्रोहियों का साथ दिया और अंग्रेजों को खदेड़ा। अंग्रेज पुरानी दिल्ली से कश्मीरी गेट की ओर भागे। लाल किले के नजदीक मौजूदा जीपीओ के पास अंग्रेजों ने अपना असलहा घर खुद ही उड़ा दिया ताकि उसमें रखे गोला-बारूद भारतीय विद्रोहियों के हाथ न आ पाएं। इस दौरान सैकड़ों अंग्रेज मारे गए। जीपीओ से सटे इलाके में उन्हीं अंग्रेजों की कब्रगाह है जिसे लोथियन कब्रगाह के नाम से जाना जाता है। यहां के सुरक्षा गार्ड बताते हैं कि ब्रिटिश छात्र यहां आकर जानकारी जुटाते हैं और तस्वीरें भी ले जाते हैं।

‘असलहा घर’ उड़ाने के बाद अंग्रेज रिज में दाखिल हो गए। करीब 200 अंग्रेजों ने जान बचाने के लिए जिस इमारत में शरण ली वही अजीत गढ़ है। ‘अजीत’ इसलिए क्योंकि 60 हजार भारतीय मिलकर भी 200 अंग्रेज सिपाहियों को हरा नहीं पाए थे। गोरों ने अपने अनुशासन, साहस और युद्ध कौशल के बल पर 60 हजार भारतीयों को तब तक रोके रखा। जब तक पंजाब से उनके लिए मदद नहीं आ गई। अंग्रेजी सैलानियों में इस जगह का बड़ा महत्त्व है। यहां पहुंच कर वे गौरव से भर जाते हैं। बिटिश सैलानियों की ओर से यहां की आंगतुक डायरी में लिखे शब्दों से साफ होता है कि उनकी नजर में इस जगह की खास अहमियत है। शायद इसलिए भी क्योंकि करीब 4 महीने बाद अंग्रेजों ने दोबारा दिल्ली फतह करने में सफलता पा ली थी। ‘अजीत गढ़’ में छुपे 200 गोरों ने 60 हजार भारतीयों को अपनी ओर बढ़ने नहीं दिया। जब पटियाला, नांबा, जींद और फरीदकोट के राजाओं की सैनिक मदद दिल्ली पहुंची तो उसे लेकर अंग्रेज सेनापति हडसन आगे बढ़े और दोबारा मोर्चा संभाल लिया। अजीत गढ़ के पास एक स्मारक पर अंग्रेजी झंडा फहराया गया। यही स्मारक फ्लैगस्टाफ टावर कहलाया। यही वजह है कि यह ब्रिटिश सैलानियों के लिए विक्टोरिया सम्मान का प्रतीक स्थल बन चुका है। इसी टावर पर 8 जून को अंग्रेजी झंड़ा लहरा कर फिरंगी दोबारा पुरानी दिल्ली की ओर बढ़े। 18 सितंबर 1857 को कश्मीरी गेट की ओर से दरवाजा तोड़ कर वे दिल्ली में दाखिल हुए। सितंबर में उन्होंने दिल्ली जीत ली और बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून भेज दिया गया।

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