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केंद्र और दिल्ली के अधिकारों में स्पष्टता जरूरी: केंद्रीय सूचना आयोग

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) ने कहा है कि दिल्ली के उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री को दो महीने के अंदर जनता को भ्रष्टाचार की शिकायतों के निवारण के संदर्भ में अपने अधिकारों, क्षेत्राधिकार और प्रक्रिया को स्पष्ट करना चाहिए...

Author नई दिल्ली | March 4, 2016 3:46 AM
केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी)

केंद्रीय सूचना आयोग (सीआइसी) ने कहा है कि दिल्ली के उपराज्यपाल, मुख्यमंत्री और केंद्रीय गृहमंत्री को दो महीने के अंदर जनता को भ्रष्टाचार की शिकायतों के निवारण के संदर्भ में अपने अधिकारों, क्षेत्राधिकार और प्रक्रिया को स्पष्ट करना चाहिए क्योंकि वर्तमान अस्पष्टता लोगों को भ्रष्टाचार से लड़ने में हतोत्साहित करेगी। आरटीआइ कार्यकर्ता विवेक गर्ग के मामले की सुनवाई करते हुए सूचना आयुक्त श्रीधर आचार्युलू ने कहा कि दिल्ली सरकार और केंद्र के अधिकारों की सीमा के संबंध में अस्पष्टता व भ्रम के मद्देनजर वाकई में स्पष्टता की जरूरत है क्योंकि वैसे भी दोनों इस मुद्दे पर कानूनी लड़ाई में उलझे हैं।

गर्ग ने दिल्ली सरकार के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो की शक्तियों के बारे में जानना चाहा है। आचार्युलू ने कहा कि जब जीएनसीटीडी और केंद्र भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के अपने अधिकार की सीमा या दायरे के बारे में जानने के न्याययापालिका के सामने खडेÞ हैं तब वकील-आवेदक आरटीआइ के तहत दस रुपए देकर आवेदन के माध्यम से पीआइओ या जन प्राधिकार प्रमुख से व्याख्या या फैसले के रूप में सूचना की उम्मीद नहीं कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई पर उनके तीन आवेदनों में उठाए गए सवालों पर गौर करने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि दिल्ली के लोगों के दिमाग में इन सवाालों को लेकर ढेरों भ्रम हैं और गर्ग खुद एक वकील हैं और वे इस मुद्दे से अच्छी तरह वाकिफ हैं।

आचार्युलू ने अपने आदेश में कहा, संसद ने जो कहा है उसे आयोग यह दोहराना चाहेगा कि आरटीआइ कानून के माध्यम से जन प्राधिकार को जनता को यह बताने का कर्तव्य है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ कहां शिकायत करें और किसे शिकायत को ग्रहण करने और उस पर कार्रवाई करने का उपयुक्त अधिकार है ताकि लोग विभिन्न सरकारी विभागों में फैले व्यापक भ्रष्टाचार पर सवाल खड़ा कर सकें।

उन्होंने कहा कि केंद्र और दिल्ली सरकार दोनों ने ही भ्रष्टाचार से लड़ने के प्रति स्पष्ट प्रतिबद्धता जताई है। ऐसे में प्रशासनिक कानून के तहत आम तौर पर और सूचना के अधिकार विशेष तौर पर यह सूचित करना सांविधिक बाध्यता है कि नागरिक भ्रष्टाचार के खिलाफ कहां शिकायत करें। आचार्युलू ने दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल के हाल के मामले का हवाला दिया जिसे एसीबी ने भ्रष्टाचार के मामले में गिरफ्तार किया। इसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

हाईकोर्ट ने एसीबी को आगे बढ़ने की हरी झंडी दी लेकिन शीर्ष अदालत ने इस आदेश पर रोक लगा दी।
उन्होंने पूछा-क्या किसी साहसी नागरिक को रिश्वतखोरी की रिपोर्ट करनी चाहिए या फिर अंतिम न्यायिक आदेश का इंतजार करना चाहिए। क्या सरकार चाहती है कि उसके नागरिक भ्रष्टाचार के खिलाफ साहसी संघर्षकर्ता हो या रिश्वतखोरी को चुपचाप सह लें क्योंकि क्षेत्राधिकार के मुद्दे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच अंतिम फैसले के लिए लंबित हैं।

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