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स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों के मां-बाप नहीं लड़ पाएंगे चुनाव, एनसीपीआर ने की कानून की मांग

देश के करोड़ों बच्चे अभी भी स्कूल नहीं जा पा रहे और शिक्षा से वंचित हैं।
Author नई दिल्ली | August 31, 2016 02:15 am
फिर एक दिन संग्राम का विजेता अपने लाव-लश्कर के साथ आया और सिंहासन पर विराजते ही बस छा गया।

स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों को स्कूल की चौखट तक लाने का एक नायाब तरीका सोचा गया है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीआर) ने दिल्ली सहित देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखकर ऐसे कानूनी प्रावधान करने की अनुशंसा की है जिससे लोगों को पंचायत या नगर निगम का चुनाव तभी लड़ने दिया जाएगा जब वे स्कूल प्रिंसिपल द्वारा जारी एक सर्टिफीकेट प्रस्तुत करेंगे कि उनके बच्चे स्कूल में दाखिल हैं और नियमित स्कूल जा रहे हैं। एनसीपीसीआर ने 26 अगस्त को राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रशासनिक प्रमुखों को लिखे पत्र में कहा है, ‘स्कूल नहीं जा रहे बच्चों को प्रेरित करने और ऐसे बच्चों को वापस स्कूल भेजने या दाखिला दिलवाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम उठाने के लिए आयोग राज्यों से अनुशंसा करता है कि वे अपने यहां के शहरी निकायों और पंचायती राज संस्थानों के चुनाव संबंधी नियमों में संशोधन कर ऐसे प्रावधान करें कि चुनाव के इच्छुक प्रत्येक उम्मीदवार, जिनके बच्चे स्कूल जाने की 6-14 वर्ष की उम्र समूह में हैं, स्कूल प्रिंसिपल से हस्ताक्षरित एक सर्टिफीकेट प्रस्तुत करें कि उनके बच्चे स्कूल में दाखिल हैं और नियमित रूप से स्कूल जा रहे हैं’।

शिक्षा का अधिकार कानून (2009) के तहत 6 से 14 साल के हरेक बच्चे को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार है, लेकिन देश के करोड़ों बच्चे अभी भी स्कूल नहीं जा पा रहे और शिक्षा से वंचित हैं। एनसीपीसीआर ने अपने पत्र में कहा है कि नियमों में इस तरह के संशोधन से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों की स्कूलों के साथ बातचीत भी बढ़ेगी जिससे उन्हें स्कूलों की समस्याओं से अवगत होने का अवसर मिलेगा। इस मुद्दे पर काम कर रहे आयोग के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा, ‘शिक्षा के अधिकार के प्रति जागरूकता पैदा करने में यह पहल मील का पत्थर साबित होगा’।

स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में सक्रिय अखिल भारतीय अभिभावक संघ के अध्यक्ष अशोक अग्रवाल ने कहा, ‘यह एक अच्छा कदम है, स्कूली शिक्षा के क्षेत्र में जितना काम किया जाए कम है। अगर किसी भी तरह की पाबंदी से लोग बच्चों को स्कूल भेजते हैं तो उसका स्वागत है। क्योंकि स्कूल से बाहर के बच्चों के जो आंकड़ें है वो भयावह हैं’। अशोक अग्रवाल के मुताबिक देश भर में करीब 10 करोड़ बच्चे स्कूल से बाहर हैं, जबकि दिल्ली में 10 लाख बच्चे स्कूल नहीं जाते हैं।  दिल्ली के इन 10 लाख बच्चों में दाखिला नहीं लेने वाले बच्चे, ड्रॉप आउट, बाल मजदूर शामिल हैं। अशोक अग्रवाल ने वोटरों के लिए भी इसी तरह के नियम की वकालत की, जिनके बच्चे स्कूल नहीं जाते उन्हें वोट का अधिकार नहीं हो।

हालांकि, देश में स्कूल नहीं जाने वाले बच्चों की संख्या पर विवाद है। यूनेस्को इंस्ट्यिूट फॉर स्टैटिस्टिक्स एंड यूनाइटेड नेशंस चिल्ड्रेंस फंड (यूनीसेफ) द्वारा अधिकृत एक शोधपत्र में कहा गया है, ‘स्कूल के बाहर के बच्चों के लिए अनुमान में अगल-अलग एजंसियों के अलग आंकड़े हैं। 2011 की जनगणना के आंकड़े स्कूल से बाहर रह जाने वाले इस आयु वर्ग के बच्चों की तादाद करीब 20 फीसद दिखाते हैं, जबकि सोशल एंड रूरल रिसर्च इंस्टीट्यूट-इंडिया मार्केट रिसर्च ब्यूरो (एसआरआइ-आइएमआरबी) 2014 के आंकड़े इसे करीब 3 फीसद बताते हैं। आंकड़ों के दूसरे स्रोतों, जिनमें यूनीफाइड डिस्ट्रिक्ट इन्फॉर्मेशन सिस्टम फॉर एजुकेशन (यू-डाइज) 2014 शामिल है, के डाटाबेस स्कूल से बाहर रह जाने वाले बच्चों की दरें 8 से 10 फीसद दिखाते हैं’।

इस शोधपत्र में यह भी सिफारिश किया गया है कि भारत जैसे एक विशाल देश में, जहां अलग-अलग राज्यों में स्कूली प्रणाली में अंतर हैं, स्कूल से बाहर रहने वाले बच्चों की परिभाषा को संशोधित करना और उसको एक समान बनाना (मानकीकरण करना) बेहतर होगा ताकि इसके राज्य के स्कूली नियमों के अनुकूल बनाया जा सके और राज्य और राष्टÑीय स्तरों पर अनुमान लगाए जा सकें। सूत्रों के मुताबिक, केंद्र सरकार की एक एजंसी इस दिशा में काम कर रही है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग का यह कदम एक अनुसंशात्मक कदम है जिसे मानने के लिए राज्य बाध्य नहीं है, फिर भी विशेषज्ञ इसे जागरूकता की दिशा में एक सकारात्मक पहल बता रहे हैं जो हर बच्चे के लिए स्कूली शिक्षा के सपने से जुड़ा है।

 

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