ताज़ा खबर
 

एनसीपीसीआर करेगा जांच, अल्पसंख्यक स्कूलों से बच्चों को मिल रहा कितना लाभ

2005 में किए गए संविधान के 93वें संशोधन के जरिए अनुच्छेद-15 खंड 5 को शामिल किया गया था, जिसके तहत गैर-वित्तपोषित संस्थानों में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण जैसे विशेष प्रावधान किए गए, लेकिन अल्पसंख्यक संस्थानों को बाहर रखा गया।

Author February 26, 2018 4:18 AM
ncpcr (photo: ncpcr.gov.in)

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (एनसीपीसीआर) जल्द ही इस मुद्दे पर एक रिपोर्ट लेकर आएगा कि संविधान के 93वें संशोधन के बाद अल्पसंख्यक स्कूलों से अल्पसंख्यक समुदाय के बच्चों को कितना लाभ मिला है और गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों में जाने वाले लगभग 2.5 करोड़ बच्चों के मौलिक अधिकारों की स्थिति क्या है? इस मुद्दे पर आयोग देश भर में 18 समीक्षा बैठकें कर चुका है और सोमवार को इसने केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा पिछले साल अल्पसंख्यक शिक्षा पर गठित निगरानी समिति की बैठक बुलाई है। आयोग की रिपोर्ट सरकार को नीतिगत बदलाव के लिए प्रेरित कर सकती है।

एनसीपीसीआर के सदस्य प्रियंक कानूनगो ने कहा, ‘अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान का स्टेटस रखने वाले स्कूल आरटीई (शिक्षा का अधिकार कानून) के दायरे से बाहर हैं, लेकिन इन संस्थानों की इस स्थिति का क्या अल्पसंख्यक बच्चों को लाभ मिल पाया है, अगर नहीं तो उसकी समीक्षा होनी चाहिए। अगर, अल्पसंख्यक बच्चे स्कूल से बाहर हैं और संस्थानों को लाभ मिला हुआ है तो क्या संस्थानों का लाभ जारी रखना चाहिए’? गैर-मान्यता प्राप्त मदरसों की बात करते हुए प्रियंक कानूनगो ने कहा कि आयोग ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा (नुहू), भोपाल, मुंबई, नागपुर, कड्डप्पा (आंध्र प्रदेश) और रांची में इस मुद्दे पर परामर्श कर और मदरसों की अंदरूनी स्थिति का पता कर पाया कि यहां पढ़ने वाले बच्चे अपने मौलिक अधिकारों से सबसे ज्यादा वंचित हैं। उनके रहने, खाने, स्वच्छता, वर्दी, कपड़े की चिंता किसी को नहीं है, न ही बैठने की व्यवस्था है। साथ ही कानूनगो ने यह भी कहा कि इन मदरसों में बच्चों को जो पढ़ाया जा रहा है वह किसी भी तरह से बुनियादी शिक्षा नहीं है।

प्रियंक कानूनगो ने कहा कि अल्पसंख्यक बच्चों की शिक्षा के मुद्दे पर आयोग एक समग्र रिपोर्ट लेकर आना चाहता है जिससे कि इस पर काम हो सके। उन्होंने कहा कि आयोग ने मदरसों के बच्चों और वहां पढ़ाने वाले मौलवियों से बात की है और देश भर में 18 समीक्षा बैठकें कर राज्य सरकारों का पक्ष जाना है। स्कूली शिक्षा से बाहर के बच्चों के मुद्दों पर देशभर के शिक्षा मंत्रियों की बैठक में भी इस पर पक्ष लिया गया है, शिक्षा पर सर्वोच्च समिति केंद्रीय सलाहकार बोर्ड (केब) की बैठक में भी रखा गया है और अब अल्पसंख्यक शिक्षा पर सबसे महत्त्वपूर्ण समिति में चर्चा भी की जाएगी। उन्होंने कहा कि यह समिति पिछले साल इसी मुद्दे पर गठित की गई थी, जिसकी यह पहली बैठक होगी।

2005 में किए गए संविधान के 93वें संशोधन के जरिए अनुच्छेद-15 खंड 5 को शामिल किया गया था, जिसके तहत गैर-वित्तपोषित संस्थानों में सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण जैसे विशेष प्रावधान किए गए, लेकिन अल्पसंख्यक संस्थानों को बाहर रखा गया। शिक्षा के अधिकार के तहत शर्त है कि गैर-वित्तपोषित शिक्षण संस्थानों को भी कमजोर तबकों के 25 फीसद विद्यार्थियों को मुफ्त शिक्षा देनी होग, लेकिन 93वें संविधान संशोधन के कारण यह प्रावधान अल्पसंख्यक स्कूलों पर लागू नहीं है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X