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नक्सली एरिया जोनल कमांडर सिद्धू कोड़ा की पुलिस कस्टडी में मौत बनी पहेली

पुलिस गिरफ्त में आया नक्सली सिद्धू कोड़ा की मौत पहेली बनी है। उसपर बिहार सरकार ने एक लाख रुपए और झारखंड सरकार ने दस लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था।

सिद्धू कोड़ा की मौत के बाद ग़ांव में पूछताछ करते सीआरपीएफ के जवान।

पुलिस गिरफ्त में आया नक्सली सिद्धू कोड़ा की मौत पहेली बनी है। उसपर बिहार सरकार ने एक लाख रुपए और झारखंड सरकार ने दस लाख रुपए का इनाम घोषित कर रखा था। वह कई सालों से फरार था और उसपर बिहार-झारखंड और छतीसगढ़ में सौ से ज्यादा नक्सली गतिविधि के पुलिस में मामले दर्ज है, जिसकी पुष्टि मुंगेर के डीआईजी मनु महाराज भी करते है। लेकिन उसकी पुलिस अभिरक्षा में हुई मौत से बिहार के जमुई जंगलों में नक्सली गतिविधि बढ़ गई है। असल में यह इसी ज़िले का वाशिंदा था। सीआरपीएफ के जवान उसके ग़ांव में कैंप कर रहे है।

हालांकि उसकी मौत हुए तीन दिन गुजर जाने के बाद भी लाश लेने कोई नहीं आया है। और उसकी लाश जमुई पुलिस की निगरानी में रखी है। बताते है कि पुलिस के डर से किसी ने भी लाश लेने की हिम्मत नहीं की है। इलाके में यह बात फैली है कि उसकी मौत पुलिस प्रताड़ना की वजह से हुई है। बताते है उसकी मौत के बाद वरमोरिया के डूमरडीहा , हँसीकोल और मंझालाडीह एक दर्जन हथियारबंद नक्सली इलाके में कोई बड़ी वारदात को अंजाम देने की फिराक में लामबंद हो रहे है।

मुंगेर के डीआईजी ने प्रेसकांफ्रेंस कर बताया कि एसटीएफ ने झरखंड के दुमका इलाके से वहां की पुलिस की मदद से उसे शुक्रवार रात गिरफ्तार कर जमुई लाया गया था। उसकी निशानदेही पर ज़िले के चकाई इलाके से उसके दो साथियों इलियास हेम्ब्रम और सुशील हांसदा को गिरफ्तार किया। इनके पास से पुलिस से लूटी एक एके47 रायफल, एक इंसास रायफल, एक रेगुलर रायफल , एक हैंडग्रेनेड और काफी मात्रा में जिंदा कारतूस बरामद किया गया।

जमुई के एसडीपीओ रामपुकार सिंह के मुताबिक शनिवार को घने जंगलों में सर्च ऑपरेशन के दौरान उसने पेट और सीने में दर्द की बात कही। उसे नजदीक के एक अस्पताल में प्राथमिक उपचार दिया गया। वहां हालत नाजुक देख जमुई सदर अस्पताल ले जाया गया। जहां डॉक्टरों ने मृत घोषित कर दिया।
हालांकि डीआईजी बताते है कि उसकी लाश का पोस्टमार्टम मानवाधिकार कानून के अनुसार मेडिकल बोर्ड का गठन कर किया गया है। साथ ही वीडियोग्राफी की गई है। और मजिस्ट्रेट जांच का आदेश दिया है।

सिद्धू कोड़ा पूर्वी बिहार और उत्तरी झारखंड इलाके का माओवादी संगठन का मुखिया था। इसे कई नामों से नक्सली साथी पुकारते थे। सिद्धू दा, सिद्धू हेम्ब्रम, मुंशी कोड़ा, लालजीत कोड़ा बगैरह। इसकी इलाके में बेहद दहशत थी। 1998 में पहली दफा इसका कारनामा सामने आया। जब इसने पुलिस गश्ती दल को डेटोनेटर से हमला कर एक मजिस्ट्रेट समेत तीन पुलिस वालों की जान ले ली थी। यह वाकया जमुई के खैरा थाना इलाके का है।

पुलिस रेकॉर्ड के मुताबिक इसपर 2001 में पुलिस दल पर हमलाकर हथियार लूट लेने का आरोप है। यह अपने को नक्सली संगठन का जोनल एरिया कमांडर घोषित किए हुए था। 2003 में जमुई के ज़िलाधीश और एसपी के काफिले पर घातक हमला किया था। ये तो बाल-बाल बच गए। मगर एक पुलिस अधिकारी शहीद हो गया। 2013 में एक एसटीएफ जवान को मौत के घाट उतारने का भी आरोप इस पर है। 2014 में बिहार के नवादा के कौआकोल थाना के एसएचओ समेत 11 पुलिस जवानों को अपने कब्जे में लेकर जान मार देने जैसे बड़े इल्जाम भी है। इसके अलावे कोड़ा के दस्ते पर सीआरपीएफ के असिस्टेंट कमांडेंट हीरा कुमार झा की हत्या का भी आरोप है।

बहरहाल इसकी मौत के बाद सीआरपीएफ की कोबरा बटालियन, एसटीएफ और पुलिस सभी जांच एजंसी चौकन्नी हो गई है। शंका है कि इसके नक्सली साथी कभी भी किसी बड़ी वारदात को अंजाम दे सकते है। इसके अलावे जांच एजंसी बिहार, झारखंड, उत्तरप्रदेश, कोलकता बगैरह में इसके धन निवेश की टोह ले रही है। बताते है कि भूखंड व दूसरे धंधे में इसने अपनी अवैध रूप से अर्जित कमाई को निवेश किया हुआ है।

देखना है इसकी मौत पर से पर्दा पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही उठ सकता है। जिसका बड़े अधिकारियों को भी इंतजार है।

 

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