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प्राकृतिक संसाधनों का लाभ स्थानीय बाशिंदों को नहीं: सीएसई

देश के प्रकृतिक संसाधनों (खानों) के दोहन का लाभ स्थानीय (बाशिंदों) गरीबों को नहीं मिल रहा है। देश के 11 राज्यों के खनिज संपदा वाले प्रमुख 50 जिलों के अध्ययन के बाद सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने यह खुलासा किया है।

Author June 9, 2017 1:58 AM

देश के प्रकृतिक संसाधनों (खानों) के दोहन का लाभ स्थानीय (बाशिंदों) गरीबों को नहीं मिल रहा है। देश के 11 राज्यों के खनिज संपदा वाले प्रमुख 50 जिलों के अध्ययन के बाद सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) ने यह खुलासा किया है। सीएसई के उप महानिदेशक चंद्रभूषण ने एक रपट जारी करते हुए कहा कि डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (डीएमएफ) के जरिए एकत्रित धन से पता चलता है कि दो साल में इस संग्रह में 5800 करोड़ रुपए जमा हुए। फिर भी अधिक संपदा वाले राज्यों में गरीबी की जड़ें गहरी हैं। गरीबी से उबारने के लिए सीएसई ने इन राज्यों में बेहतर योजनाओं व निगरानी तंत्र की जरूरत बताई है।
उन्होंने बताया कि मार्च 2015 में खान व खनिज संपदा कानून के तहत डीएमएफ की स्थापना की गई थी। जिसका मकसद था कि खनिज संपदा निकालने वाली कंपनियों के मुनाफे में से कुछ पैसा डीएमएफ में जमा कराया जाए। जिसे बाद में स्थानीय गरीबों के कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च किया जाए। सीएसई ने डीएमएफ में आने वाले धन पर काम करके कहा कि 11 राज्यों में किए अध्ययन से पता चला कि जिन चार राज्यों में सर्वाधिक गरीबी है उन्हीं राज्यों में डीएमएफ में सबसे ज्यादा धन आया है। चौंकाने वाला पहलू यह भी है कि डीएमएफ में आने वाले कुल धन का 70 फीसद हिस्सा ओड़ीशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ से आया है। जहां सबसे ज्यादा गरीब हैं। इन राज्यों में करीब 40 फीसद आबादी गरीबी रेखा से नीचे है।

चंद्रभूषण ने कहा कि पीने के पानी की दिक्कत लगभग सभी जगह है। जिसे सभी जिलों में प्राथमिकता दी गई है। कोयले की खानों की वजह से अत्यधिक प्रदूषित शहर धनबाद ने इससे डीएमएफ को दिए जाने वाले धन का 62 फीसद हिस्सा पीने के पानी की आपूर्ति के लिए दिया है। कंपनियां रॉयल्टी के तौर पर कुछ धन डीएमएफ में देती है। जिनसे योजनाएं बना कर बेहतरी के लिए काम होना है। लेकिन 50 जिलों में से केवल 17 जिलों में योजनाएं तैयार मिलीं 24 जिलों ने केवल यह बताया कि योजनाएं तैयार हैं लेकिन उनका ब्लू प्रिंट उनके पास नहीं है। जबकि बाकी का कुछ पता नहीं। सीएसई ने सुझाव दिया है कि बेहतर ढंग से योजना बना कर उन पर वास्तव मे अमल किया जाए तो इन राज्यों को गरीबी के दलदल से बाहर निकाला जा सकता है।
डीएमएफ को चाहिए कि इसके दफ्तर बना कर स्थानीय स्तर पर योजना तैयार कर उन्हें अमली जामा पहनाने के लिए नियमित काम करें।

 

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