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संस्कृत में बातचीत करना सीखेंगे पांच गांवों के लोग, राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान निभाएगा यह जिम्मेदारी

मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की ओर से राज्यसभा को लिखित में दी गई जानकारी के मुताबिक संस्कृत को आम लोगों की बोली जाने वाली भाषा बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार के तीन संस्थानों को दो-दो गांवों गोद लेने की सलाह दी थी।

श्री लालबहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (नई दिल्ली) और राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (त्रिपुरा) भी लेंगे दो-दो गांव गोद।

साढ़े तीन साल से भी अधिक पुरानी भाषा संस्कृत को आम लोगों तक पहुंचाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (आरकेएस) ने देश के पांच गांवों को गोद लिया है। इनमें त्रिपुरा में जुबार्ता, हिमाचल प्रदेश में मसोत, कर्नाटक के चित्तेबैल, केरल में अदात और मध्यप्रदेश में बराई गांव शामिल हैं। आरकेएस केंद्रीय मानव संसाधन विकास (एचआरडी) मंत्रालय के तहत संचालित संस्थान हैं।

एचआरडी मंत्री रमेश पोखरियाल ‘निशंक’ की ओर से राज्यसभा को लिखित में दी गई जानकारी के मुताबिक संस्कृत को आम लोगों की बोली जाने वाली भाषा बनाने के उद्देश्य से केंद्र सरकार के तीन संस्थानों को दो-दो गांवों गोद लेने की सलाह दी थी। इनमें राष्ट्रीय संस्कृत संस्थान (आरकेएस), श्री लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (एसएलबीएसआरएसवी)-नई दिल्ली और राष्ट्रीय संस्कृत विद्यापीठ (आरएसवी)-त्रिपुरा शामिल हैं जो गोद लिए गांवों के लोगों को संस्कृत पढ़ाएंगे ताकि सभी संस्कृत में बातचीत कर पाएं। आरकेएस ने पहले ही पांच गांवों को गोद ले लिया है। बाकी दो संस्थानों ने अभी गांवों को गोद नहीं लिया है। ये जल्द ही इस प्रक्रिया को पूरी करेंगे। पिछले महीने एचआरडी मंत्री निशंक की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय भाषा संस्थानों के प्रमुखों की बैठक में निर्देश दिया गया था कि संस्कृत को आगे बढ़ाने और इस भाषा के संरक्षण के लिए कम से कम दो संस्कृत भाषी गांव विकसित करने की जरूरत है।

मंत्री की ओर से राज्यसभा को दी लिखित जानकारी के अनुसार संस्कृत भाषा को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने विभिन्न कदम उठाए हैं। इसके तहत आदर्श संस्कृत महाविद्यालय या शोध संस्थानों को वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है। संस्कृत पाठशाला से लेकर महाविद्यालय स्तर तक के योग्य विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति दी जा रही है। संस्कृत के उच्च शिक्षण संस्थानों और संस्कृत भाषा के लिए काम करने वाले गैर सरकार संगठन (एनजीओ) को भी सरकार की ओर से वित्तीय सहायता दी जा रही है। शास्त्र चुडामणि योजना के तहत संस्कृत के प्रख्यात विद्वानों को शिक्षण के कार्य में लगाया जा रहा है। इतना ही नहीं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, आयुर्वेद संस्थानों, माडर्न महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में नॉन-फोरमल संस्कृत एजुकेशन प्रोग्राम के तहत नॉन-फोरमल संस्कृत एजुकेशन केंद्र के माध्यम से भी संस्कृत भाषा को पढ़ाया जा रहा है। संस्कृत भाषा के लिए हर साल 16 वरिष्ठ विद्वानों और पांच युवा विद्वानों को राष्ट्रपति पुरस्कार दिया जाता है। संस्कृत की दुर्लभ पुस्तकों के प्रकाशन और पुनर्मुद्रण के लिए भी सरकार की ओर से वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है। ‘अष्टादशी’ के तहत संस्कृत भाषा को जन-जन की भाषा बनाने के लिए 18 प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं।

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