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हिंदी के मशहूर साहित्यकार नामवर सिंह का निधन, ओम थानवी ने लिखा- हिंदी में फिर सन्नाटे की खबर

हिंदी के मशहूर साहित्यकार डॉ. नामवर सिंह ने मंगलवार रात दिल्ली के एम्स अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे 92 वर्ष के थे। जनवरी 2019 के दौरान वे अपने घर में गिर गए थे, जिसके बाद उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था।

Author Updated: February 20, 2019 7:14 PM
हिंदी के मशहूर साहित्यकार नामवर सिंह। फोटो सोर्स : इंडियन एक्सप्रेस

हिंदी के मशहूर साहित्यकार डॉ. नामवर सिंह का मंगलवार रात करीब 11:15 बजे निधन हो गया। वे 92 वर्ष के थे। उन्होंने दिल्ली स्थित एम्स में अंतिम सांस ली। बता दें कि जनवरी 2019 में नामवर सिंह घर में अचानक गिर गए थे। इसके बाद उनका स्वास्थ्य बिगड़ता चला गया, जिसके चलते उन्हें एम्स में एडमिट कराया गया था। बुधवार दोपहर (आज) लोधी रोड स्थित श्मशान घाट पर उनका अंतिम संस्कार हुआ। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने उनके निधन पर ट्वीट लिखा, ‘‘हिंदी में फिर सन्नाटे की खबर। नायाब आलोचक, साहित्य में दूसरी परम्परा के अन्वेषी, डॉ. नामवर सिंह नहीं रहे। मंगलवार को आधी रात होते-न-होते उन्होंने आखिरी सांस ली। कुछ समय से एम्स में भर्ती थे। 26 जुलाई को वह 93 के हो जाते। उन्होंने अच्छा जीवन जिया, बड़ा जीवन पाया। नतशीश नमन।’’

हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे डॉ. नामवर : डॉ. नामवर सिंह का जन्म जुलाई 1926 के दौरान उत्तर प्रदेश के चंदौली जिले में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के बड़े रचनाकार हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य थे। डॉ. नामवर को हिंदी साहित्य जगत को बड़ा समालोचक माना जाता था। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी मिला था।

जहां से पढ़ाई की, वहां बच्चों को पढ़ाया : मशहूर साहित्यकार डॉ. नामवर ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) से हिंदी साहित्य में एमए और पीएचडी की थी। इसके बाद उन्होंने बीएचयू में काफी समय तक अध्यापन कार्य भी किया। उन्होंने मध्य प्रदेश की सागर और राजस्थान की जोधपुर यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाया। आखिरी में वे दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) आ गए। डॉ. नामवर सिंह जनयुग और आलोचना नाम की 2 हिंदी पत्रिकाओं में संपादक भी रहे। 1959 में उन्होंने भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर चकिया-चंदौली सीट से चुनाव लड़ा, हार का सामना करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने बीएचयू में पढ़ाना छोड़ दिया।

इन रचनाओं ने रोशन किया नाम : डॉ. नामवर ने हिंदी साहित्य को नई ऊंचाइयां दीं। उन्होंने व्यक्तिव्यंजक निबंधों के संग्रह के अलावा कविताएं और विविध विधाओं की गद्य रचनाएं लिखीं। वहीं, हिंदी के विकास में अपभ्रंश का योग (1952), पृथ्वीराज रासो की भाषा (1956) पर शोध भी किया। पृथ्वीराज रासो का संशोधित संस्करण अब ‘पृथ्वीराज रासो : भाषा और साहित्य’ नाम से मिलता है। इनके अलावा उन्होंने आलोचनाएं भी लिखीं। इनमें प्रमुख आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियां (1954), छायावाद (1955), इतिहास और आलोचना (1957) भी लिखीं। साथ ही, नई कहानी (1964), कविता के नए प्रतिमान (1968), दूसरी परंपरा की खोज (1982) व वाद विवाद और संवाद (1989) आदि कहानियों की रचना की।

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