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नागपुर यूनिवर्सिटी में नया ट्रेंड: बर्थडे पर स्‍टूडेंट्स को मिल रहे कंडोम, सैनिटरी नैपकिंस

इस गुट का उद्देश्य लोगों के बीच से इन चीजों को लेकर बने हुए मिथक, गलतफहमी और हिचकिचाहट को दूर करना है। खास बात ये है कि इस पहल से अब छात्रों की सोच में बदलाव आ रहा है।

Author Updated: November 11, 2018 8:01 PM
नागपुर यूनिवर्सिटी के छात्रों ने की पहल। (image source-Pixabay)

जन्मदिन पर आमतौर पर लोगों को विभिन्न गिफ्ट्स मिलते हैं और लोग अपने दोस्तों और परिजनों के साथ केक काटते हैं। लेकिन जन्मदिन पर कंडोम और सैनिटरी नैपकिन मिलने की बात थोड़ी अजीब लग सकती है। लेकिन नागपुर यूनिवर्सिटी में सचमुच ऐसा हो रहा है। दरअसल नागपुर यूनिवर्सिटी के अमरावती रोड स्थित कैंपस में पढ़ने वाले पोस्ट ग्रेजुएट छात्रों के एक ग्रुप ने जन्मदिन पर कंडोम और सैनिटरी नैपकिन बतौर गिफ्ट देने की शुरुआत की है। इस गुट का उद्देश्य लोगों के बीच से इन चीजों को लेकर बने हुए मिथक, गलतफहमी और हिचकिचाहट को दूर करना है। खास बात ये है कि इस पहल से अब छात्रों की सोच में बदलाव आ रहा है और वो इन प्रोडक्ट्स को वर्जित मानने वाली मानसिकता से बाहर निकल रहे हैं।

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, छात्रों का यह ग्रुप अपने ग्रुप के साथी को उसके जन्मदिन पर कंडोम के 3 पीस और एक सैनिटरी नैपकिन का पैक बतौर गिफ्ट देता है। यह गिफ्ट लड़का और लड़की दोनों को दिया जाता है। ताकि लोगों में दूसरे लिंग के लोगों के प्रति एक समझ पैदा हो। खबर के अनुसार, इस ग्रुप में इंदू धोमने, प्रिया कोम्बे, समर्थ तभाने, शबीना शेख और विकेश तिमांदे शामिल हैं। सभी राजनीति विज्ञान के अंतिम वर्ष के छात्र हैं। छात्रों की इस पहल को मिल रहे समर्थन के बाद अब ये ग्रुप एड्स के प्रति जागरुकता फैलाने की दिशा में भी काम शुरु कर दिया है।

बता दें कि छात्रों के इस गुट ने जन्मदिन में कंडोम और सैनिटरी नैपकिन छात्रों को देने के साथ ही कुछ प्रोफेसर को भी ऐसा ही गिफ्ट दिया। हालांकि छात्रों को अपनी इस पहल के लिए विरोध भी झेलना पड़ा। इस ग्रुप की एक छात्रा का कहना है कि वह लोग अपनी इस पहल के जरिए सेक्स को प्रमोट नहीं कर रहे हैं। लेकिन ये बात फैक्ट है कि युवा वर्ग 16-17 साल की उम्र में ही सेक्सुअली एक्टिव हो जाता है। हम इसे कंट्रोल नहीं कर सकते, लेकिन हम इसके द्वारा फैलने वाली बीमारियों और इंफेक्शन को जरुर रोक सकते हैं। एक छात्र का कहना है कि यह एक बायोलॉजिकल तथ्य है और हम सभी को इसे वर्जित मानने वाली सोच से बाहर निकलने की जरुरत है।

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