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दिल्ली मेरी दिल्लीः जनता क्यों भुगते

तीनों निगमों के कर्मचारी हड़ताल पर हैं। दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों हर ओर कूड़े के ढेर दिखने लगे हैं। आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार का दावा है कि उसने निगमों को पूरा पैसा दे दिया है।

Author नई दिल्ली | February 1, 2016 1:46 AM

तीनों निगमों के कर्मचारी हड़ताल पर हैं। दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों हर ओर कूड़े के ढेर दिखने लगे हैं। आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार का दावा है कि उसने निगमों को पूरा पैसा दे दिया है। भाजपा के लोग जबरन हड़ताल करवा रहे हैं। सरकार की मांग है कि इसकी जांच होनी चाहिए कि पैसे गए कहां? वहीं तीनों निगमों में काबिज भाजपा का आरोप है कि दिल्ली सरकार पैसे नहीं दे रही है और चौथे वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू भी नहीं कर रही है। दूसरी ओर कांग्रेस दिल्ली की इस हालत के लिए आप और भाजपा को दोषी ठहरा रही है। लोग बेहाल हैं और निगमों के कर्मचारी वेतन न मिलने से परेशान।

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यह कहकर इलाज कराने बंगलुरु चले गए कि निगमों को भंग कर देना चाहिए। यह अजीब बात है कि एक ओर तो आप के नेता निगमों को भंग करके चुनाव करवाने की मांग कर रहे हैं और दूसरी ओर निगमों की महीनों से खाली पड़ी 13 सीटों पर चुनाव न कराने के बहाने तलाश रहे हैं। आखिरकार अब अदालत के आदेश से चुनाव होने वाले हैं। अगर दिल्ली सरकार कुछ नहीं कर रही है तो केंद्र इस मामले में क्यों नहीं दखल दे रही है। पार्टियों की आपसी तनातनी का खमियाजा दिल्ली की जनता को क्यों भुगतना पड़ रहा है।

बयानबहादुर भाजपा
भाजपा के नेता दिल्ली विधानसभा चुनाव की हार से सबक लेने को तैयार नहीं हैं। चुनाव से पहले दिल्ली में भाजपा की सरकार बनने की संभावना थी, लेकिन फैसला न ले पाने के चलते न भाजपा की सरकार बनी और न समय से चुनाव हो पाए। उस चुनावी हार के बाद से ही प्रदेश में बदलाव की अटकलें चल रही हैं। साल बीत गए लेकिन बदलाव नहीं हुआ। विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी जिस ढर्रे पर चल रही थी, आज भी उसी पर चल रही है। नतीजा यह हुआ है कि भाजपा बयानों की पार्टी बनकर रह गई है। भाजपा चुनाव इसलिए हारी क्योंकि उसके वोटरों में बढ़ोतरी नहीं हुई। जल्द ही निगमों के चुनाव होने वाले हैं। चुनाव में क्या होगा यह तो पता नहीं, लेकिन भाजपा में माहौल तो पहले जैसा ही दिख रहा है।
देर से जागी कांग्रेस
दिल्ली में राजनीतिक लड़ाई को तिकोना बनाने की कांग्रेस की हर कोशिश नाकाम हो रही है। ताजा विवाद निगम कर्मचारियों को वेतन न मिलने के चलते सफाई कर्मचारियों की हड़ताल का है। भाजपा का आरोप है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार निगम को पूरे पैसे नहीं दे रही है जिसके चलते हालात खराब हो गए हैं, जबकि दिल्ली सरकार का कहना है कि उसने पूरे पैसे दे दिए हैं और भाजपा जान-बूझकर सरकार को बदनाम करने के लिए आंदोलन कर रही है। आप समर्थक कर्मचारी नेता केंद्र के खिलाफ और भाजपा के नेता आप के खिलाफ आंदोलन कर रहे हैं। कांग्रेस के पूर्व विधायक जयकिशन दोनों के खिलाफ आंदोलन चला रहे हैं लेकिन इसकी शुरुआत थोड़ी देर से हुई। अब भला देरी से जागने वाले को उतना लाभ कहां मिल सकता है जितना सवेरे जगने वाले को मिलेगा।

आगे कुआं, पीछे खाई
सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डॉक्टरों और अधिकारियों का यही हाल है। उनके मुताबिक, सरकार ने जनता की वाहवाही लूटने के लिए जीबी पंत जैसे सुपर स्पेशिलिटी अस्पताल तो खोल दिए हैं, लेकिन लाखों की तादाद में आने वाले मरीजों के बारे में सोचा ही नहीं। यहां हालत एक अनार, सौ बीमार जैसी है। ऊपर से वीआइपी और वीवीआइपी मरीजों के फरमान। डॉक्टर कहते हैं कि फरमान सुनें या जनता की फरियाद। नतीजा, आए दिन होने वाले मरीजों और चिकित्साकर्मियों की नूराकुश्ती। ऐसे में, कुछ डॉक्टरों ने ‘कूल’ रहना सीख लिया है। जीबी पंत अस्पताल के अधिकारी के कक्ष में कुछ ऐसा ही नजारा दिखा। अधिकारी ने बड़ी तसल्ली से एक मरीज की फरियाद सुनी। मरीज ने बताया कि नंबर लेने के बावजूद ओपीडी में डॉक्टर ने देखने से मना कर दिया। मरीज की शिकायत पर अधिकारी ने संबंधित कर्मचारी को बुलाया। अधिकारी के सामने अपनी बात रखने के दौरान मरीज और कर्मचारी आपस में ही उलझ गए। यह देख अधिकारी शांति से अपना दूसरा काम निपटाने लगे, इस बीच उन्होंने इस पत्रकार के सवालों का जवाब भी दिया। इसको कहते हैं, सर्वाइवल आॅफ फिटेस्ट यानी योग्यतम की उत्तरजीविता।

कैसी ईमानदारी
दिल्ली सरकार और नगर निगम में हो रहे आरोप-प्रत्यारोप से दिल्ली का बंटाधार तो हो ही रहा है, लेकिन सबसे ज्यादा खमियाजा उन्हें भुगतना पड़ रहा है जिन्हें तीन महीने से वेतन नहीं मिला। उत्तरी दिल्ली मुख्यालय में चतुर्थ श्रेणी की एक महिला कर्मचारी से बेदिल का सामना हुआ। उससे पूछा कि आप लोगों को समय से वेतन नहीं मिल रहा तो कैसे काम चल रहा है। छूटते ही उसने कहा कि हम जैसे कर्मचारियों की स्थिति बदतर इसलिए हो रही है क्योंकि नेताओं में आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गया है। इसके बजाय अगर सभी लोग वेतन पर ध्यान दें तो समस्या का हल बहुत मुश्किल नहीं होगा। इस बात से यह तो तय है कि जब खाने को ही नहीं मिलेगा तो काम ईमानदारी से कैसे होगा?

एसएचओ की लाटसाहबी
दिल्ली के दक्षिणी-पूर्वी जिले के एक थाने के एसएचओ का बुरा हाल है। उनका दिन पुलिस मुख्यालय में चक्कर काटते-काटते बीत रहा है। वे अपने विभागीय अधिकारियों के साथ मुख्यालय में घूमते रहते हैं ताकि कहीं उनकी फरियाद सुन ली जाए। हालत यह हो गई है कि एसएचओ अब ठीक से अपनी बात भी नहीं रख पा रहे। बेदिल को मिली जानकारी के मुताबिक, एसएचओ की इस हालत की जिम्मेदार उनकी लाटसाहबी है। एक वीवीआइपी के दौरे के वक्त कई संदेश देने के बाद भी ये एसएचओ मौके पर नहीं पहुंचे, लिहाजा उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई का फरमान जारी कर दिया गया। हालांकि एसएचओ का तर्क है कि उन्हें ऐसी कोई सूचना नहीं मिली, लेकिन अगर वे मुख्यालय में अपने आला अधिकारियों के आगे-पीछे चक्कर काट रहे हैं तो दाल में कुछ न कुछ तो काला है।

पराठे हुए बेस्वाद
चांदनी चौक खाने-पीने के शौकीन लोगों की पसंदीदा जगह है, लेकिन इन दिनों वहां जाने वाले लोग जरा सावधान रहें। खासकर पराठे वाली गली की ओर कदम बढ़े तो पराठे खाए बिना ही यात्रा यादगार बन जाएगी। संभव है कि यहां जाने वाले को यह जगह ‘उलटी वाली गली’ के रूप में याद रहे। दिल्ली नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल के कारण पराठे वाली गली के मुहाने पर भारी मलबा डाला गया है। लोग नाक पर रुमाल डालकर यहां से आ-जा रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो चांदनी चौक के दही भल्ले, जलेबी, पराठे, सब बेस्वाद हो गए हैं।

परेड से गायब दिल्ली
इस बार गणतंत्र दिवस परेड में राजपथ पर दिल्ली की झांकी नहीं नजर आई। दिल्ली की झांकी का न होना चर्चा का विषय बना रहा। इस पर एक दर्शक की चुटकी लाजबाब रही कि दिल्ली के ‘मुखिया’ को पुलिस व उपराज्यपाल से लड़ने से फुरसत मिले तब तो वे झांकी निकालने की सोचें!
-बेदिल

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