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उनके सितम के खिलाफ आवाज समीना की

इसे प्रथा कहें या कुप्रथा, यह तय करने तो अदालत बैठी है, लेकिन तीन तलाक के फरमान का खौफ मुसलिम महिलाओं की ‘आस्था’ तक को हिला जाता है।

Author नई दिल्ली | May 13, 2017 12:28 AM
बहुत कम उलेमा इस व्यवस्था के पक्षधर हैं। गोया यह विषय मुसलिम समाज के आंतरिक वाद-विवाद का विषय बन चुका है। ऐसे में क्या यह जरूरी है कि कोई राजनीतिक दल मुसलिम महिलाओं के लिए अपने घड़ियाली आंसू बहाता फिरे?

इसे प्रथा कहें या कुप्रथा, यह तय करने तो अदालत बैठी है, लेकिन तीन तलाक के फरमान का खौफ मुसलिम महिलाओं की ‘आस्था’ तक को हिला जाता है। इन तीन लफ्जों से दो बार तार-तार हो चुकी जिंदगी को बड़े हौसलों से समेटे हुए डॉ समीना कहती हैं : मंदिर में सात फेरे ले लूंगी, लेकिन तीसरा निकाह नहीं करूंगी…। यह उस दर्द का ही जोर है जो समीना को तीन तलाक के पीछे ‘मौलानाओं की साजिश’ का स्याह सच सामने रखते हुए मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड पर प्रतिबंध लगाने तक की वकालत करने की हिम्मत देता है। समीना की निगाह में हलाला वह ‘लालच’ है जो तीन तलाक को बनाए रखने के लिए मौलनाओं को मजबूर करता है।
समीना एक शायर थीं, नज्में लिखती थीं। लेकिन पहली दफा खत के जरिए भेजे गए तलाक के तीन लफ्जों बाकी पेज 8 पर उङ्मल्ल३्र४ी ३ङ्म स्रँी 8
ने उन्हें डॉ समीना (एक्यूप्रेशर) बना दिया, तो दूसरी बार फोन पर सुनाए गए इन्हीं लफ्जों ने उन्हें सामाजिक और राजनीतिक कार्यकर्ता समीना बना दिया। 1999 में हुई पहली शादी से लेकर 2012 में दूसरी तलाक तक के लगभग 14 सालों के सफर ने समीना को इतनी हिम्मत दे दी है कि वे उन प्रथाओं और संस्थानों पर जमकर कुठाराघात करती हैं जो उनकी निगाह में केवल मौलानाओं के प्रश्रय और गलत प्रचार के कारण औरतों को झेलनी पड़ रही हैं, नहीं तो इस्लाम और कलाम पाक ने औरतों को सारे हक दिए हैं।
बकौल समीना, उनकी दोनों बार की तलाक गलत थी। यह सब हो ही इसलिए रहा है कि मौलानाओं को अपने सहूलियत से कानून बनाकर अपनी दुकान चलानी है। ये इस्लाम को बिल्कुल गलत तरफ ले जा रहे हैं। ये चाहते हैं कि ज्यादा से ज्यादा तलाक हों ताकि ज्यादा से ज्यादा हलाला हो, इनको पैसा भी मिलता है और अय्याशी के लिए एक रात के लिए औरत भी मिल जाती है।

समीना कहती हैं: अगर 100 तलाक हुईं हैं तो उनमें 20 ऐसी होती हैं जिसमें शौहर मौलाना के पास जाकर कहता है कि गुस्से में या नशे बोल दिया, बीवी वापस चाहिए। मौलाना यह नहीं कहते कि तलाक हुई नहीं, वे झट से फतवा जारी करते हैं कि तलाक हो चुकी, अब हलाला ही उपाय है। हलाला के लिए खानदान में कोई चाहेगा नहीं, फिर लाचार आदमी मौलाना से रास्ता पूछता है। लेकिन वह रास्ता क्या बताएगा, उनके अपने एजंट होते हैं, हलाला के लिए पूरा ग्रुप बना कर रखते हैं, पैसे पर लड़के मुहैया कराने को। इसलिए तलाक नहीं होंगी तो हलाला कैसे होगा। इनको तीन तलाक की आड़ में हलाला से प्यार है।
समीना के मुताबिक, नकली डिग्रीधारी मौलानाओं ने मुसलिम लोगों को औरतों के साथ गुंडागर्दी करने की पूरी छूट दे रखी है। इन्होंने कुछ अपनी किताबें निकाली हैं, जिसमें कलाम पाक के बिल्कुल विपरीत तलाक का जिक्र है। वे बदलाव की आस लगाए कहती है: इस्लाम में जो मूल प्रक्रिया है वह बहुत सख्त और औरतों के हक में है। हम उस प्रक्रिया को तो मानेंगे, लेकिन, लेटर से, वाट्सऐप से, ई-मेल से, फेसबुक से, फोन से या फिर एक ही बार में तीन बार तलाक कहने की प्रथा को हम नहीं मानेंगे। इन सब पर प्रतिबंध लगना चाहिए। मुसलिम पर्सनल लॉ बोर्ड अगर नहीं राजी होता है तो उस पर भी प्रतिबंध लगना चाहिए, पूरा सिस्टम इन्होंने ही बिगाड़ा हुआ है, मैं इनके खिलाफ लड़ूंगी ।
तीन बेटों की मां समीना यों तो फिलहाल शादी का खयाल नहीं रखतीं, लेकिन कहती हैं: तीसरी शादी का कभी मन बना तो किसी हिंदू से सात फेरे ले लूंगी, लेकिन निकाह नहीं करूंगी। उनका कहना है गैर-मजहब में शादी का खयाल आज कई मुस्लिम महिलाओं के अंदर है। बेटों के जिक्र पर समीना ने बताया कि बड़े दो बेटे जो 14 और 13 साल के हैं, वे कहते हैं- मम्मी इन मौलानाओं को नहीं बख्शना।

अपनी दोनों शादियों को किस्मत का मजाक बताते हुए समीना बताती हैं कि कैसे पहले शौहर ने एक मुशायरे में उन्हें देखने के बाद उनके वालिद पर दबाव बनाकर उनसे शादी की। लेकिन शादी के अगले दिन से ही दहेज की मांग शुरू हो गई और मारपीट उनकी जिंदगी का हिस्सा बन गया। 14 जून 2004 को एक खत के जरिए उन्हें भेजे तीन तलाक तक उनकी जिंदगी संभल, पटना, कानपुर और दिल्ली के बीच शौहर की दरिंदगी का शिकार होती रही। इस हादसे के बाद दो बेटों की मां समीना के वालिद ने उन्हें संभल से दिल्ली भेज आगे पढ़ाया। उन्होंने क्लीनिक भी खोला। फिर प्रॉपर्टी के कारोबार में आईं। समीना का कहना है कि 2012 तक उनकी जिंदगी मजे में कट रही थी। एक बार वे प्रॉपर्टी खरीद-फरोख्त के सिलसिले में बुलंदशहर गईं। वहां कुछ लोगों से मुलाकात के बाद दूसरी शादी का दबाव पड़ा। घर वालों ने भी उनकी हां में हां मिलाई। नतीजा दूसरा निकाह हुआ एक शादीशुदा मर्द से। इसलिए वे दिल्ली में ही रहीं जहां शौहर कभी-कभी आता। ज्यादा समय इंतजार में ही बीतता। मकान बनाने के नाम पर काफी मोटी रकम खींच चुके शौहर के बजाय एक दिन जो आया, वह था फोन पर तीन लफ्जों का तलाक। उस समय समीना की गोद में 15 दिन का तीसरा बेटा था और वालिद को गुजरे 40 दिन भी नहीं हुए थे।
हालांकि डॉ समीना ने अतीत को काफी पीछे धकेल नई पहचान हासिल कर ली है, लेकिन इन हादसों से आहत शायरा की हाथ से छूटा कलम छूटा ही रहा…बस किसी शायर का एक शेर दामन से चिपक कर रह गया है… चमकते चांद को टूटा हुआ तारा बना डाला।

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