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दशहरे पर अयोध्‍या में होगी अनूठी रामलीला, मुस्लिम कलाकार करेंगे रामायण का मंचन

90 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया पर रामायण की गहरी छाप है।

Author September 11, 2017 12:26 PM
रामलीला प्रदर्शन की तस्वीर ( Express photo by Vishal Srivatav)

दशहरा करीब आ रहा है और भगवान राम की नगरी अयोध्या इन दिनों अपने राम और सीता की तैयारियों में जोरशोर से जुटी है। अबकी बार यहां एक अनूठी रामलीला का मंचन होने जा रहा है जिसमें मुस्लिम आबादी बहुल देश इंडोनेशिया के मुस्लिम कलाकार पहली बार राम लीला का मंचन करेंगे।

इंडोनेशिया में मुस्लिमों के बहुसंख्यक होने के बावजूद वहां रामलीला में बहुत आस्था है। यहां मुस्लिम राम को महान और रामायण को आदर्श ग्रंथ मानते हैं। भारत में ऋषि वाल्मीकि की रामायण, तो इंडोनेशिया में कवि योगेश्वर की लिखी रामायण का मंचन किया जाता है। वहां, दशरथ को विश्वरंजन, सीता को सिंता, हनुमान को अनोमान कहा जाता है।

इंडोनेशिया में तीन तरह की रामलीला होती हैं, जिसमें पपेट, शैडो पपेट और बैले रामलीला हैं। इस बार इंडोनेशिया के कलाकार लगभग 13 दुर्लभ वाद्य यंत्रों के साथ प्रस्तृति देंगे। 12 कलाकार मुस्लिम हैं, जिनमें 6 पुरुष और 6 महिलाएं हैं। इंडोनेशिया की रामायण की एक खासियत यह भी है कि कलाकार रामलीला की शुरुआत सीता हरण से करते हैं और रावण के वध पर समाप्त कर देते हैं।

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प्रदेश के संस्कृति एवं धार्मिक कार्य विभाग के मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी ने भाषा को बताया, ‘इंडोनेशिया की एक रामलीला समिति अयोध्या और लखनऊ में 13 से 15 सितंबर के बीच रामलीला का मंचन करेगी। मंचन करने वाले कलाकार मुस्लिम हैं और वे मांसाहारी नहीं हैं।’

रामलीला के मंचन की तैयारियों को अंतिम रूप दिये जाने के बीच चौधरी ने कहा, ‘पहली बार राज्य में इस तरह की रामलीला का मंचन हो रहा है, जिसमें विदेशी कलाकार हिस्सा ले रहे हैं और सभी मुस्लिम हैं।’

इतिहास बताता है कि रामायण का इंडोनेशियाई संस्करण सातवीं सदी के दौरान मध्य जावा में लिखा गया था। तब यहां मेदांग राजवंश का शासन था लेकिन रामायण के इंडोनेशिया पहुंचने से बहुत पहले ही रामायण में इंडोनेशिया का जिक्र था। ईसा से कई सदी पहले लिखी गई वाल्मीकि रामायण के किष्किंधा कांड में वर्णन है कि कपिराज सुग्रीव ने सीता की खोज में पूर्व की तरफ रवाना हुए दूतों को यवद्वीप और सुवर्ण द्वीप जाने का भी आदेश दिया था। कई इतिहासकारों के मुताबिक यही आज के जावा और सुमात्रा हैं।

चौधरी ने कहा कि इंडोनेशिया के मुस्लिम कलाकारों के रामलीला मंचन के जरिए हम ये संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि मुस्लिम बहुल देश होने के बावजूद वहां के कलाकारों को रामलीला का मंचन करने में कोई दिक्कत नहीं है।

उन्होंने कहा, ‘जो कलाकार रामलीला मंचन करेंगे, वे मांसाहारी नहीं हैं और ना ही किसी तरह की हिंसा में भरोसा करते हैं। जब उन्हें (विदेशी कलाकार) भगवान राम को स्वीकारने में कोई दिक्कत नहीं है तो हमारे यहां क्या दिक्कत है।’

अयोध्या में अवध विश्वविद्यालय के स्वामी विवेकानंद सभागार में रामलीला का मंचन होगा। विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. मनोज दीक्षित ने कहा कि इससे कई सीख मिलती हैं। रामलीला का इंडोनेशिया से सुदृढ सांस्कृतिक संबंध है। हम चाहते हैं कि राम नगरी होने के कारण अयोध्या में अधिक से अधिक देशों की रामलीला का मंचन हो। दुनिया भर में 65 देश हैं, जहां रामलीला का मंचन होता है।

उन्होंने कहा कि भारत में सौ तरह की रामलीलाएं होती हैं और हम इन रामलीलाओं का मंचन अयोध्या में कराने का प्रयास कर रहे हैं। 90 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले इंडोनेशिया पर रामायण की गहरी छाप है। हिंदी के प्रसिद्ध विद्वान फादर कामिल बुल्के ने 1982 में अपने एक लेख में कहा था, ‘वियतनाम से इंडोनेशिया तक यह कथा फैली हुई है।

इसी प्रसंग में फादर बुल्के अपने एक मित्र हॉलैन्ड के डाक्टर होयकास का हवाला देते थे। डा० होयकास संस्कृत और इंडोनेशियाई भाषाओं के विद्वान थे। एक दिन वह केंद्रीय इंडोनेशिया में शाम के वक्त टहल रहे थे। उन्होंने देखा एक मौलाना जिनके बगल में कुरान रखी है, इंडोनेशियाई रामायण पढ़ रहे थे। होयकास ने उनसे पूछा, मौलाना आप तो मुसलमान हैं, आप रामायण क्यों पढते हैं। उस व्यक्ति ने केवल एक वाक्य में उत्तर दिया- और भी अच्छा मनुष्य बनने के लिये!

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