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जब नृत्य में उतरे मूषक, मयूर, नंदी और सिंह

नृत्यांगनाओं ने गणपति के गजेंद्र, विनायक, हस्तीमुख, लंबोदर रूपों को दर्शाया। मूषक के चलन को मोहक अंदाज में पेश किया। इस प्रस्तुति के दौरान छंद ‘हर हर शिव विगलित गणपति वाहनम’ व ‘प्रथम शिव तनय गणपति तारणम’ का प्रयोग भी मनोरम था।

कुचिपुडी व भरतनाट्यम नृत्यांगना आनंदा शंकर

कमानी सभागार में शंकरानंद कलाक्षेत्र के कलाकारों ने अपने मोहक नृत्य से समां बांध दिया। नंदी और सिंह की कथा पर आधारित नृत्य रचना पेश की गई। इस नृत्य की संरचना कुचिपुडी व भरतनाट्यम नृत्यांगना आनंदा शंकर ने की थी। जबकि समारोह की परिकल्पना संस्कृतिविद् डॉ सोनल मानसिंह और श्री कामाख्या कलापीठ सेंटर फॉर इंडियन क्लासिकल डांस ने की थी। नृत्य प्रस्तुति का आरंभ गणपति स्तुति से हुआ। यह रचना ‘वागार्थ प्रतिपद्म जगत पितरौ वंदे’ व ‘विकट सुंदरदंती मुखम’ पर आधारित थी।

नृत्यांगनाओं ने गणपति के गजेंद्र, विनायक, हस्तीमुख, लंबोदर रूपों को दर्शाया। मूषक के चलन को मोहक अंदाज में पेश किया। इस प्रस्तुति के दौरान छंद ‘हर हर शिव विगलित गणपति वाहनम’ व ‘प्रथम शिव तनय गणपति तारणम’ का प्रयोग भी मनोरम था। इसी के अगले अंश में कार्तिकेय के प्रसंग को पेश किया गया। मयूर के चलन को पेश करते हुए, यह प्रवेशदरू मनोरम प्रतीत हुआ। वहीं, रचना ‘मुरूगन कुमारन मरदन वरदन’ के माध्यम से कार्तिकेय के जीवन चरित को संक्षिप्त रूप से निरूपित किया गया।

अगले अंश में दो नृत्यांगनाओं ने नंदी और सिंह की कथा को व्याख्यायित किया। उनकी लयात्मक गतियां और विभिन्न ताल आवर्तनों में अंगों व पैरों की गतियां प्रभावकारी थीं। शिव के वाहन नंदी और देवी पार्वती के वाहन सिंह के प्रसंग का यह चित्रण था। इसके लिए रचना ‘नंदी केशव महाभाग शिववाहनम’ व ‘अनन्य शक्ति भवानी मानिनी सिंहवाहिनी’ का चयन किया गया था। इसके पश्चात शिव व पार्वती के विवाह और अन्य प्रसंगों को नृत्य में पेश किया गया। इसमें भगवान शिव के पुरुष रूप व उनके तांडव पक्ष को विवेचित किया गया। वहीं देवी पार्वती के प्रकृति रूप व उनके लास्य भाव को चित्रित किया गया। नृत्य में तांडव व लास्य का संतुलित समावेश सुंदर था।

शिव और पार्वती के जीवन चरित्र को दर्शाने के लिए रचना ‘अस्य उत्तर दिशि हिमालय नाम नागाधिराज’ का प्रयोग किया गया। नृत्य को कलाकारों ने विभिन्न जतीस के प्रयोग से लयात्मक बनाया। नायिका पार्वती के रूप में वरिष्ठ नृत्यांगना आनंदा शंकर का संचारी भाव काफी परिपक्व था। शिव और पार्वती के विवाह प्रसंग को मुख आंगिक अभिनय के जरिए कलाकारों ने चित्रित किया। शृंगार रस का यह समागम मनोरम था। प्रसंगवश नंदी पर सवार शिव और सिंह पर सवार पार्वती को दर्शाना लासानी था। नृत्यांगना आनंदा शंकर कुचिपुडी और भरतनाट्यम नृत्य शैली में पारंगत हैं। वह नृत्य प्रस्तुति के साथ युवा कलाकारों को सिखाती हैं, यह बड़ी बात है। आनंदा शंकर परंपरागत विषयों को लेकर नृत्य रचना करती रही हैं।

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