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केंद्र और राज्य सरकार के टकराव के बीच होंगे नगर निगम के चुनाव

नए संशोधन के हिसाब से दस साल बाद तीन के बजाय एक निगम के चुनाव के लिए परिसीमन का काम लगभग पूरा हो गया है।

केंद्र और राज्य सरकार के टकराव के बीच होंगे नगर निगम के चुनाव
सांकेतिक फोटो।

मनोज कुमार मिश्र

सीटों के प्रारूप पर एतराज आने और उसके हिसाब से सीटों का आरक्षण आदि का काम पूरा करके भी अगर एतराज ज्यादा न हुआ तो दिल्ली नगर निगम के चुनाव गुजरात और हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव के साथ इस साल के अंत तक करा लिए जाएंगे। इस बार का नगर निगम चुनाव केंद्र और राज्य सरकार के बीच चल रहे टकराव के बीच होगा।

अब 2022 में हुए दिल्ली नगर निगम (संशोधन), 2022 विधेयक के तहत 272 बजाए 250 सीटों के लिए चुनाव होंगे। सीटें बढ़ने, एक निगम का तीन निगम बनने के बावजूद 15 साल से निगम पर भाजपा का कब्जा है। लगातार भारी बहुमत से दूसरी बार दिल्ली सरकार में काबिज आम आदमी पार्टी (आप) प्रयास करके भी दिल्ली की कोई लोकसभा सीट या निगम चुनाव जीत नहीं पाई। इस बार पंजाब चुनाव जीतने के बाद उसके हौसले बुलंद है। इसीलिए आप नेताओं का आरोप है कि निगम चुनाव हारने के डर से भाजपा ने निगम चुनाव घोषित होने के दिन तीनों निगमों को एक निगम करने के बहाने चुनाव टाल दिया।

परिसीमन के जानकार वरिष्ठ कांग्रेस नेता चतर सिंह का कहना है कि 250 सीटों के परिसीमन को जो प्रारूप सामने आया है उसमें तमाम अनियमितताएं हैं। अगर इसमें सुधार न किया गया तो इसे कोई भी अदालत में चुनौती दे सकता है। इसी तरह की गड़बड़ी के कारण ही पूर्व उप महापौर रमेश दत्ता 2007 में अदालत गए और 66 सीटों में चुनाव आयोग को बदलाव करना पड़ा।

परिसीमन 2011 की जनगणना के आधार पर किया गया है। इस हिसाब से हर सीट 65,675 आबादी की बननी चाहिए। इसमें १० फीसद बदलाव किया जा सकता है लेकिन सीटें 35 हजार से लेकर 93 हजार तक की बना दी गई है। औसत तीन निगम सीटें हर विधानसभा में बननी थी। पहले भी मटियाला में सात सीटें बनी। इस बार भी मटियाला, बवाना और विकासपुरी विधानसभा सीट में छह-छह सीटें बनाई गई है। दो सीटें तो नई दिल्ली नगर पालिका परिषद और छावनी परिषद के अधीन है। बाकी 68 में से तीन में छह-छह,38 में तीन-तीन, 17 में चार-चार और दस में पांच-पांच सीटें बनाई गई।

एतराज इस पर नहीं है। आबादी के हिसाब से पटेल नगर, पटपड़गंज और विश्वास नगर में तीन बननी थीं, चार बना दीं। मंगोलपुरी, त्रिलोकपुरी, कोंडली और सीमापुरी में चार बननी थीं, तीन बना दीं। बुराड़ी में छह बननी थीं पांच बना दीं। आरोप यह भी लगाया जा रहा है कि दलित आबादी वाली सीटें बड़ी और सामान्य वाली छोटी बनाई गई हैं। इस बार परिसीमन के लिए बनी कमेटी में एसोसिएट सदस्य बनाए ही नहीं गए हैं। सीटों के ड्राफ्ट पर कई और एतराज किए जा रहे हैं।

बावजूद इसके अगर ज्यादा विवाद नहीं हुआ तो चुनाव कुछ महीनों में हो जाएंगें। दिल्ली में नगर निगम 1957 में संसद ने विधेयक लाकर बनाया गया था। तब से अब तक उसमें कई संशोधन हुए लेकिन चुनाव दूसरी बार ही टाले गए हैं। नगर निगम में सुधार के नाम पर ही एक बार पहले को 14 साल चुनाव टाले गए।

1983 में पुराने विधान के हिसाब से चुनाव हुए थे। तब कांग्रेस चुनाव जीती थी। उसे 1990 तक विस्तार देकर भंग किया गया। स्थानीय निकायों और ग्राम पंचायतों के लिए संसद में हुए 73 वे और 74 वे संशोधनों के बाद नए विधान से 1997 में चुनाव हुए। उस चुनाव में भाजपा को जीत मिली। आबादी के हिसाब से अनुसूचित जाति के लिए 42 सीटें आधी सीटें(125) महिलाओं के लिए आरक्षित की जाएगी।

नई व्यवस्था में नगर निगम दिल्ली सरकार के बजाए केन्द्र सरकार के अधीन कर दी गई है। केन्द्र में भाजपा की सरकार है यानी निगम अभी भी भंग होने के बाद भी भाजपा के पास है। तभी तो दिल्ली के उपराज्यपाल दिल्ली सरकार से निगम का बकाया मांग रहे हैं। गैर भाजपा मतों का विभाजन होने के चलते भाजपा महज 36 फीसद वोट लाकर भी तीन बार से निगम चुनाव जीतती रही है। कांग्रेस के हाशिए पर जाने से इस बार भाजपा और आप में मुकाबला माना जा रहा है।

केन्द्र और दिल्ली में पहले भी अलग-अलग दल की सरकारें रही हैं और उसी तरह पहले भी उपराज्यपाल केन्द्र सरकार के हिसाब से बनते रहे हैं। टकराव भी कई बार हुआ लेकिन वह ज्यादा लंबा नहीं चला। न ही टकराव स्तरहीन हुआ। विधानसभा की बैठक उपराज्यपाल के नाम पर उनकी ही अनुमति से बुलाई जाती है। उसी विधानसभा में सत्ता में बैठी आम आदमी पार्टी(आप) उप राज्यपाल पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उन्हें हटाने के लिए धरना दे रही है।

आबकारी नीति में भ्रष्टाचार के आरोप की जांच शुरू होने के बाद उपराज्यपाल पर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। हालात ऐसे बन गए हैं कि नगर निगम का बकाया देने की मांग दिल्ली सरकार से खुद उपराज्यपाल कर रहे हैं।

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First published on: 28-09-2022 at 05:56:33 am
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