Bihar News: बिहार के प्रशासनिक और वन महकमे के बीच हाल ही में एक ऐसा अनोखा समझौता हुआ है, जिसने नई बहस छेड़ दी है। राज्य के सड़क निर्माण विभाग (RCD) और वन विभाग के बीच हुए एक समझौता ज्ञापन के तहत, वन विभाग ने उस सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए वन मंजूरी हासिल करने की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले ली है।

अहम बात यह है कि इसे खुद वन भूमि पर सड़क विभाग द्वारा ही निष्पादित किया जाना है। इस कदम को प्रशासनिक स्तर पर हितों के टकराव और वैधानिक प्रक्रियाओं के लिहाज से काफी संवेदनशील माना जा रहा है।

एनएच-333 से जुड़ा है पूरा मामला

यह एमओयू गत 26 सितंबर को बिहार के वन बल प्रमुख (HoFF) अरविंदर सिंह और सड़क निर्माण विभाग के इंजीनियर-इन-चीफ उमाकांत रजक के बीच साइन किया गया था। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य मुंगेर जिले के गंगटा जंगल से गुजरने वाले नेशनल हाईवे 333 (NH-333) के 10.5 किलोमीटर लंबे हिस्से को सिंगल-लेन से टू-लेन कैरिजवे में बदलना है।

इस प्रोजेक्ट की कुल संशोधित लागत 51 करोड़ रुपये तय की गई है, जिसका उद्देश्य क्षेत्र में सड़क संपर्क को बेहतर बनाना और यातायात को सुगम करना है।

वन विभाग की दोहरी भूमिका

इस समझौते की सबसे बड़ी विसंगति यह है कि जिस वन विभाग की मूल जिम्मेदारी जंगलों और वन्यजीवों की रक्षा करना है, वही विभाग अब एक सड़क परियोजना को धरातल पर उतारने और उसके लिए कानूनी अनुमतियां दिलाने का सीधा साझेदार बन गया है।

एमओयू की शर्तों के मुताबिक, वन विभाग को वन डायवर्जन स्वीकृतियों के लिए तेजी से प्रक्रिया पूरी करने और सभी संबंधित अधिकारियों के साथ सहयोग करने का निर्देश दिया गया था।

पर्यावरण मंत्रालय के परिवेश पोर्टल के अनुसार, इस प्रोजेक्ट के लिए भीमबांध वन्यजीव अभ्यारण्य की 2.1 हेक्टेयर वन भूमि की आवश्यकता है, जिसका प्रस्ताव काफी समय से राज्य स्तर पर लंबित है।

वित्त प्रबंधन और प्रशासनिक जिम्मेदारियों का अजीब बंटवारा

इस समझौते में केवल वन मंजूरी ही नहीं, बल्कि वित्तीय और प्रशासनिक कामों का भी अनूठा बंटवारा किया गया था। एमओयू के प्रावधानों के अनुसार, मुंगेर के प्रभागीय वन अधिकारी को इस प्रोजेक्ट का ड्रॉइंग एंड डिसबर्सिंग ऑफिसर बनाया गया था, जो सड़क निर्माण विभाग के कार्यकारी अभियंता द्वारा बिलों की जांच और काउंटर-साइन करने के बाद ठेकेदार को भुगतान करते।

इसके अलावा, निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच और इंजीनियरिंग संबंधी काम सड़क विभाग के अभियंताओं के जिम्मे थे, जबकि मैदानी स्तर पर दोनों विभागों को समन्वय बनाकर काम करना था।

विवाद बढ़ता देख MoU वापस लेने का हुआ निर्णय

जब इस पूरे मामले और वन विभाग की भूमिका तथा सड़क विभाग के साथ हुए इस समझौते के बीच हितों के टकराव को लेकर सवाल खड़े हुए, तो वन बल प्रमुख अरविंदर सिंह ने मीडिया और जानकारों के सामने स्पष्ट किया कि उस एमओयू को अब वापस लिया जा रहा है।

हालांकि, विभाग के शीर्ष अधिकारियों की ओर से अभी तक यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि आखिर किन परिस्थितियों में और किस उद्देश्य के तहत इस तरह के अनूठे समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे, जिसने पर्यावरणविदों और प्रशासनिक गलियारों का ध्यान अपनी ओर खींचा।

विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन की चुनौती

यह पूरा प्रकरण देश में बुनियादी ढांचे के विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच तालमेल बिठाने की चुनौतियों को उजागर करता है। बिहार में यातायात और कनेक्टिविटी को मजबूत करने के लिए सड़कों का चौड़ीकरण जरूरी है, लेकिन इसके लिए तय वैधानिक और पारदर्शी प्रक्रियाओं का पालन करना उतना ही आवश्यक है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वन भूमि पर किसी भी विकास कार्य को आगे बढ़ाते समय प्रशासनिक पारदर्शिता और कानूनी दायित्वों का कड़ाई से पालन होना चाहिए ताकि नियमों और पर्यावरण के साथ किसी भी प्रकार का समझौता न हो।

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