मुंबई की सड़कें इन दिनों बारिश के पानी से लबालब हैं, अंडरपास डूबे हुए हैं और लोग घुटनों तक पानी में चलकर दफ्तर पहुंच रहे हैं। दूसरी तरफ उसी शहर के लाखों घरों की टोंटियों में पानी की कमी बनी हुई है। सवाल उठता है कि जब पूरा शहर पानी में डूबा है तो पीने का पानी आखिर कहां चला गया?

दरअसल, सड़कों पर भरा बारिश का पानी और घरों तक पहुंचने वाला पेयजल एक ही रास्ते से नहीं आता। यही वजह है कि भारी बारिश के बावजूद मुंबई इस समय जलभराव और पेयजल संकट, दोनों का सामना एक साथ कर रही है।

मुंबई समेत पूरे महाराष्ट्र में इन दिनों मानसून पूरी ताकत से बरस रहा है। बुधवार को शहर के कई इलाकों में 24 घंटे के भीतर 100 मिमी से ज्यादा बारिश दर्ज की गई। इसका असर यह हुआ कि अंधेरी सबवे समेत कई निचले इलाके पानी में डूब गए। वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं और लोगों को घंटों जाम में फंसना पड़ा। जगह-जगह जलभराव के कारण रोजमर्रा की जिंदगी प्रभावित हो गई।

लेकिन इसी बीच एक और आंकड़े ने चिंता बढ़ा दी। इंडिया टूडे की खबर के मुताबिक बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के अनुसार, मुंबई को पानी उपलब्ध कराने वाले सात जलाशयों में कुल उपयोगी जल भंडारण घटकर केवल 6.93 प्रतिशत रह गया है। पिछले साल इसी समय इन जलाशयों में करीब 39.5 प्रतिशत पानी था। यानी इस बार हालात पिछले साल की तुलना में कहीं ज्यादा गंभीर हैं।

इस विरोधाभास की वजह समझना जरूरी है। शहर की सड़कों पर जमा होने वाला बारिश का पानी सीधे नालों और ड्रेनेज सिस्टम में चला जाता है। अगर कम समय में बहुत ज्यादा बारिश हो जाए या नालों की क्षमता कम पड़ जाए तो पानी सड़कों पर भर जाता है। वहीं पीने का पानी देने वाले जलाशय इस बारिश से तुरंत नहीं भरते। उन्हें भरने के लिए कई दिनों और कई हफ्तों तक लगातार बारिश की जरूरत होती है, ताकि उनके कैचमेंट क्षेत्रों से पानी धीरे-धीरे बहकर जलाशयों तक पहुंच सके।

मुंबई को रोजाना करीब 4,000 मिलियन लीटर पेयजल सात प्रमुख जलाशयों से मिलता है। इनमें भातसा, अपर वैतरणा, मोडक सागर, तानसा, मिडिल वैतरणा, तुलसी और विहार झील शामिल हैं। ये सभी जलाशय मुंबई शहर के भीतर नहीं, बल्कि ठाणे, पालघर और नासिक जैसे आसपास के जिलों में स्थित हैं। इसलिए केवल मुंबई में हुई तेज बारिश से इनका जलस्तर नहीं बढ़ता। जरूरी यह है कि इन जलाशयों के कैचमेंट क्षेत्रों में भी लगातार अच्छी बारिश हो।

इस बार मानसून मुंबई में देर से पहुंचा

इस बार पेयजल संकट की सबसे बड़ी वजह जून में मानसून का देर से पहुंचना रहा। आमतौर पर दक्षिण-पश्चिम मानसून 10 जून के आसपास मुंबई पहुंच जाता है, लेकिन इस साल इसमें देरी हुई। इस दौरान जलाशयों से हर दिन हजारों मिलियन लीटर पानी शहर को मिलता रहा, जबकि उनमें नया पानी उम्मीद के मुताबिक नहीं पहुंच सका। बीएमसी के आंकड़ों के अनुसार, 17 जून को जलाशयों में 10.01 प्रतिशत पानी था, जो 29 जून तक घटकर 6.93 प्रतिशत रह गया।

बारिश का वितरण भी हर जगह एक जैसा नहीं होता। उदाहरण के लिए, हाल की बारिश में तुलसी झील क्षेत्र में 179 मिमी और विहार झील क्षेत्र में 110 मिमी वर्षा हुई, जबकि ठाणे स्थित मोडक सागर में केवल 38 मिमी बारिश दर्ज की गई। यही कारण है कि सभी जलाशय एक साथ और समान गति से नहीं भरते। किसी एक दिन मुंबई में मूसलाधार बारिश होने का मतलब यह नहीं कि पूरे जलाशय तंत्र में पर्याप्त पानी पहुंच गया।

इसी स्थिति को देखते हुए बीएमसी पहले ही पानी की आपूर्ति में 10 प्रतिशत कटौती लागू कर चुकी है और औद्योगिक व व्यावसायिक उपयोग पर भी अतिरिक्त प्रतिबंध लगाए गए हैं। मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दिनों में अच्छी बारिश की संभावना है, लेकिन जलाशयों को सामान्य स्तर तक पहुंचने के लिए लगातार कई हफ्तों की वर्षा जरूरी होगी। यानी फिलहाल मुंबई में यह अजीब स्थिति बनी रह सकती है कि बाहर सड़कों पर बारिश का पानी बहता रहेगा, जबकि घरों की टोंटियों से पानी अब भी सीमित मात्रा में ही आएगा।

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