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Mumbai: बिल्डर ने 12 साल से नहीं दिया पजेशन, अब फ्लैट के साथ देना होगा 21 लाख रुपए मुआवजा

मुंबई में एक महिला ने बिल्डर द्वारा फ्लैट का कब्जा न दिए जाने पर उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया। अदालत के बिल्डर को सख्त आदेश देते हुए खरीदार को मुआवजा देने को कहा है।

प्रतीकात्नक फोटो फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

मुंबई में एक बिल्डर फर्म को समय से फ्लैट का पजेशन नहीं देने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ेगी। उपभोक्ता आयोग ने बिल्डर फर्म से खरीदार को मुआवजा देने के लिए कहा है। आयोग के आदेश के मुताबिक खरीदार को मुआवजे के रूप में लोअर परेल इलाके में 790 वर्गफीट का फ्लैट और 21 लाख रुपए मुआवजे के तौर पर देने होंगे। खरीदार ने साल 2005 में 71 लाख की संपत्ति खरीदी थी लेकिन उसे फ्लैट पर कब्जा नहीं दिया गया था। आयोग ने बिल्डर प्रार्थना एंटरप्राइजेस द्वारा बुकिंग राशि के रूप में दिए गए 64 लाख रुपए वापस देने से इनकार कर दिया। आयोग ने कहा कि बिल्डिंग के निर्माण के समय बिल्डर के सामने क्या समस्याएं आईं ये खरीदार की चिंता नहीं है।

दो महीने में देना होगा फ्लैटः अदालत ने कहा कि अगर दो महीने में बिल्डर द्वारा फ्लैट नहीं दिया जाता है तो उसे लोअर परेल निवासी मधुमती लेले श्रीवास्तव को हर महीने 50 हजार रुपए का भुगतान करना होगा। मुआवजे की राशि में उस किराए की रकम भी शामिल है जिसे श्रीवास्तव को इतने वर्षों में चुकाना पड़ा।

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साल 2015 में महाराष्ट्र उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग को सौंपी गई अपनी शिकायत में श्रीवास्तव ने बताया कि उन्होंने 13वीं मंजिल, प्रार्थना हाइट्स में फ्लैट बुक किया था। 26 दिसंबर 2005 को उन्होंने एग्रीमेंट पर साइन किए थे। उन्होंने बताया कि वे 64 लाख रुपए का भुगतान कर चुकी थीं जिसमें स्टांप शुल्क भी शामिल था। दिसंबर 2007 में उन्हें फ्लैट का कब्जा मिलना था। हालांकि ऐसा नहीं हुआ।

किराया राशि देने का किया था वादाः श्रीवास्तव ने बताया कि फ्लैट मिलने में देरी के कारण बिल्डर द्वारा कब्जा (पजेशन) दिए जाने तक किराया राशि 50 हजार प्रति माह देने पर सहमति बनी थी। महिला ने बताया कि न तो बिल्डर ने एक भी महीने का किराया दिया गया और न ही उन्हें फ्लैट पर कब्जा दिया गया। महिला ने फ्लैट पर कब्जे की मांग की और कहा कि वह बाकी 7 लाख भी देने को तैयार थी, अगर उन्हें विकल्प के रूप में मौजूदा फ्लैट के 1 किमी के दायरे में समान सुविधाओं के साथ समान आकार का फ्लैट दे दिया जाता। बिल्डर ने अपनी सफाई में कहा कि कब्जा देने में उन्हें देरी हुई, क्योंकि समय-समय पर निगम से उन्हें काम रोकने के नोटिस मिल रहे थे।

शिकायतकर्ता की गलती नहींः आयोग ने कहा, ‘स्टॉप वर्क नोटिस और दूसरे कारणों से यह बात बहुत स्पष्ट है कि शिकायतकर्ता की इन सबमें कोई भूमिका नहीं है।’ आयोग ने कहा कि तथ्य के मुताबिक बिल्डर ने फ्लैट पर कब्जा नहीं दिया जैसा कि सहमति बनी थी।

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