मध्य प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा भोजशाला परिसर को मंदिर घोषित किए जाने के फैसले पर ऑल इंडिया इमाम एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना साजिद रशीदी ने सवाल उठाए हैं। रशीदी ने एएनआई से बातचीत में कहा कि यह एकतरफा फैसला है और जिस जज ने यह फैसला दिया है, उसके बेटे को सरकार ने अपने पैनल में शामिल कर लिया।
रशीदी ने कहा कि 700-800 साल पुरानी मस्जिद जिसमें पांचों टाइम की नमाज होती थी, यहां 2003 में एएसआई ने जुमे की नमाज पढ़ने का आदेश दिया था। रशीदी ने सवाल उठाया कि क्या उस वक्त एएसआई में हिंदू अफसर नहीं थे? क्या उनको इस बात का पता नहीं था कि यह मंदिर है?
मौलाना रशीदी ने कहा कि पूर्व लोकसभा स्पीकर सुमित्रा महाजन के पति उस वक्त एएसआई में थे और उनकी रिपोर्ट है कि यह मस्जिद है और मंदिर का कोई अवशेष इसमें नहीं है।
रशीदी ने कहा कि इन सारी बातों के बावजूद भी फैसला दे दिया गया और कह दिया गया कि यह मंदिर है। मौलाना रशीदी ने कहा कि मुसलमानों के पास सुप्रीम कोर्ट जाने का विकल्प बचा था और हम वहां पहुंच गए हैं।
एएसआई के आदेश को कर दिया था रद्द
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने धार के भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर मामले में हाल ही में फैसला सुनाया था। अदालत ने इसकी धार्मिक प्रकृति वाग्देवी (सरस्वती) के मंदिर के तौर पर तय की थी। अदालत ने विवादित परिसर में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिए जाने का आदेश दिया था और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के सात अप्रैल, 2003 के उस आदेश को रद्द कर दिया था जिसमें मुस्लिमों को हर शुक्रवार को यहां नमाज अदा करने की इजाजत दी गई थी।
हाई कोर्ट में मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू, मुस्लिम और जैन समुदायों के याचिकाकर्ताओं ने दलीलें पेश कीं थीं और विवादित स्मारक में अपने-अपने समुदाय के लोगों के लिए उपासना का विशेष अधिकार मांगा था। बेंच ने मुस्लिम और जैन पक्षों की ओर से दायर चार याचिकाएं खरिज कर दी थीं।
अदालत के फैसले को लेकर मुस्लिम पक्ष का कहना था कि वह इससे संतुष्ट नहीं है और इसे शीर्ष अदालत में जल्द से जल्द चुनौती दी जाएगी।
हाई कोर्ट ने 11 मार्च, 2024 को एएसआई को भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। एएसआई ने सर्वेक्षण के बाद 15 जुलाई 2024 को हाई कोर्ट में अपनी रिपोर्ट पेश की थी।
‘बाबरी के फैसले जैसी समानताएं’
AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने धार जिले के भोजशाला परिसर से संबंधित आदेश की कड़ी आलोचना की। उन्होंने दावा किया कि यह निर्णय भारत के संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर।
