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विदेशी सैलानियों का हो रहा है खजुराहो के ऐतिहासिक मंदिरों से मोहभंग

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का ज्ञान देने वाला खजुराहो बुरे दिनों से जूझ रहा है। विदेशी सैलानियों का खजुराहो के श्रंगारिक मंदिरों से मोह भंग होता जा रहा है, जिसके पर्यटन उद्योग को झटका लगा है और यहां के कई नामचीन होटल बिकने की तैयारी में है।

Author छतरपुर (मप्र) | July 24, 2016 4:44 AM
शिवराज सिंह चौहान। ( file picture)

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष का ज्ञान देने वाला खजुराहो बुरे दिनों से जूझ रहा है। विदेशी सैलानियों का खजुराहो के श्रंगारिक मंदिरों से मोह भंग होता जा रहा है, जिसके पर्यटन उद्योग को झटका लगा है और यहां के कई नामचीन होटल बिकने की तैयारी में है। विकास के नाम पर अरबों रुपए खर्च होने के बावजूद खजुराहो की दशा और दिशा नहीं बदलना इसका कारण माना जा रहा है। आंकड़े बताते हैं कि खजुराहो आने वाले विदेशी पर्यटकों की संख्या हर साल घटती जा रही है। पिछले साल 2015 में यहां 65,034 विदेशी पर्यटक आए थे। 2012 में 97,724 विदेशी और 2,60,946 देशी पर्यटक खजुराहो के मंदिरों पहुंचे थे। 2013 में देशी पर्यटकों की संख्या तो 2,76,434 पंहुच गई लेकिन विदेशी पर्यटकों की संख्या 89,511 रह गई। इसी तरह 2014 में विदेशी पर्यटकों की संख्या फिर घटकर 74,706 पर आ गई। 2015 में तो विदेशी पर्यटकों ने मानो खजुराहो से मुंह ही मोड़ लिया और उनकी संख्या घटकर 65,034 रह गई। हालांकि देशी पर्यटकों की संख्या में मामूली बढोतरी हुई।

पर्यटन उद्योग को आर्थिक ताकत देने के लिए मुख्यतय: विदेशी सैलानियों की भूमिका अहम होती है। विदेशी सैलानियों की कम होती संख्या के कारण खजुराहो के होटल व्यवसायी सबसे बुरे दौर से गुजर रहे हंै। यहां का पंचतारा होटल जस ओबेराय पहले ही रेडिसन गुप्र ने खरीद लिया है। वहीं चंदेला होटल के भी बेचे जाने की खबरें हंै। होटल ऊषा बुंदेला बंद हो चुका है। इन सहित अन्य छोटे होटल और रेस्तरां भी बंद होने या बिकने की कगार पर है।

खजुराहो के विकास के नाम पर अरबों रुपए खर्च किए जा चुके है। मगर पंहुच मार्ग सहित अन्य सुविधाओं का आज भी अभाव है। पिछले साल 12 दिसंबर 2015 को खजुराहो के अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे का जोरशोर से उद्घाटन किया गया, पर यहां कोई अंतरराष्ट्रीय हवाई सुविधा शुरू नही हुई। इंडियन एयरलाइंस की हवाई सेवा भी सप्ताह में तीन दिन है। पर्यटन व्यवसाय के जानकार शरद शुक्ला का कहना है कि विदेशी पर्यटक खजुराहो की कामोद्दीपक छवि से ऊब चुके हंै। इसके अलावा पर्यटन व्यवसाय को वृहद रूप देने के लिए आसपास के स्थलों को भी विकसित नही किया गया जिसके दम पर यहां सैलानियों को यहां रोका जा सके। हालांकि खजुराहो के स्थानीय विकास के नाम पर घोटले ही सामने आए हैं। 2012 में निवेशकों के सम्मेलन के दौरान खजुराहो की चकाचौंध पर करोड़ों रुपए व्यय किए गए थे। मगर आज स्थिति यह है कि खजुराहो के ऐतिहासिक तालाब कचराघर बन सडांध मार रहे हैं। वही पश्चिमी मंदिर समूह को जोड़ने वाली मुख्य सड़क को छोड़ अंदर झांका जाए, तो उस खजुराहो के दर्शन होते है, जिसका हर अंग बदरंग होकर सैलानियों को असली पीड़ा दिखाता है।

खजुराहो के दिन पलटने का दावा किया गया था। इंडियन आयल फाउंडेशन ने मंदिरों को नया स्वरूप देने के लिए जो आकर्षक ड्राईंग तैयार की थी, उसे जुलाई 2013 में केंद्रीय पर्यटन मंत्रालय से अनुमति मिल गई थी। 2002 में खजुराहो सांसद सत्यव्रत चतुर्वेदी की पहल पर खजुराहो को नया स्वरूप देने की योजना को केंद्र सरकार ने मंजूरी दी थी। जुलाई 2002 में देश के हर राज्य में एक हेरिटेज स्थल को विकसित किए जाने की योजना इंडियन आयल फाउंडेशन ने बनाई थी। इसी क्रम में देश के पांच हेरिटेज स्थलों का चुनाव कर प्रथम क्रम में खजुराहो को शामिल किया गया था।

ये योजनाएं सरकारी फाइलों में बंद होकर रह गईं। बुदेलखंड के खजुराहो और ओरछा के पर्यटन व्यवसाय से कई लोग जुडे हंै। बुंदेलखंड की दुर्दशा सुधर जाए, अगर पर्यटन व्यवसाय को गति मिले। जिसके लिए जरूरी है कि इसे प्रदेश सहित अन्य पर्यटन स्थलों से जोड़ा जाए। प्रदेश कांग्रेस के उपाध्यक्ष राजा पटैरिया ने रेल्वे बोर्ड के जीएम एवं रेल मंत्री को पत्र लिखकर खजुराहो को भोपाल से जोड़ने की मांग की है। उनका कहना है कि ललितपुर, टीकमगढ और छतरपुर जिले के पर्यटन स्थलों को जोड़ती यह रेल सुविधा पर्यटन उद्योग के लिये वरदान साबित होगी।

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