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हम तो कोरोना को चबा जाएंगे, हम मेहनत करने वाले हैं नाजुक नहीं’, बिहार में क्वरंटीन में रह रहे प्रवासी मजदूरों का जज्बा

22 साल के जितेंद्र कुमार घूम रहे हैं। पूछे जाने पर कि क्या उन्हें घर में नहीं होना चाहिए? उन्होने कहा "कोरोना? हम तो कोरोना को चबा जाएंगे। हम लोग मेहनत करने वाले आदमी हैं।

Author Edited By सिद्धार्थ राय नई दिल्ली | Updated: April 8, 2020 10:35 AM
22 साल के जितेंद्र कुमार यहां घूम रहे हैं। पूछे जाने पर कि क्या उन्हें घर में नहीं होना चाहिए? उन्होने कहा “कोरोना? हम तो कोरोना को चबा जाएंगे। हम लोग मेहनत करने वाले आदमी हैं।(Express photo by Santosh Singh)

22 साल के पप्पू कुमार माधोपुर मिडिल स्कूल के एक क्लासरूम में अपने बिस्तर के किनारे पर बैठे फोन चला रहे हैं। पप्पू इस स्कूल में क्वारंटाइन कर रहे हैं। 24 मार्च को पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा से कुछ दिन पहले चंडीगढ़ के एक आटा मिल में मजदूरी करने वाला पप्पू पटना से 15 किलोमीटर दूर अपने गाँव वापस आया था। लेकिन पप्पू को 14 दिनों के लिए इस स्कूल में रहने को कहा गया जो कि क्वारंटाइन सेंटर बन गया है। उसके कमरे में एक दर्जन से ज्यादा बिस्तर हैं और बगल वाला बिस्तर खाली है।

लॉकडाउन से पहले या उसके दौरान राज्य में लगभग 1.8 लाख प्रवासी मजदूरों लौटे हैं। जिनमें से लगभग 27,300 मजदूर 17 मार्च के बाद आए हैं, उन्हें 3,115 स्कूलों और पंचायत भवन में भेजा गया है। इन सभी स्कूलों और भवनों को क्वारंटाइन सेंटर बनाया गया है। द इंडियन एक्सप्रेस ने दानापुर नदी क्षेत्र में तीन से पांच क्वारंटाइन सेंटर का दौरा किया। इस छेत्र में छह पंचायत आती हैं जिसमें 80,000 की संयुक्त आबादी है। यहां प्रत्येक घर से कम से कम एक व्यक्ति राज्य के बाहर काम करता है। इस दौरान इंडियन एक्सप्रेस ने पाया कि बहुत सारे प्रवासी मजदूरों के नाम इस 14 दिन की क्वारंटाइन लिस्ट से गायब थे।

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हवासपुर स्कूल जो अब क्वारंटाइन सेंटर में बादल दिया गया है में दोपहर के भोजन का समय है। मेनू में आज चावल, दाल, आलू, सब्जियां और पापड़ हैं। स्कूल के बाहर बाजार में हलचल है, किराने की दुकानों और रेहड़ी वाले आलू टिक्की और लिट्टी बेच रहे हैं। यहां लॉकडाउन जैसा कुछ भी देखने को नहीं मिल रहा है। 22 साल के जितेंद्र कुमार यहां घूम रहे हैं। पूछे जाने पर कि क्या उन्हें घर में नहीं होना चाहिए? उन्होने कहा “कोरोना? हम तो कोरोना को चबा जाएंगे। हम लोग मेहनत करने वाले आदमी हैं। शहरवालों की तरह नाजुक नहीं हैं। हम लोगों का कोरोना कुछ नहीं बिगाड़ सकता।”

गाँव के कुछ लोगों ने बताया कि सही ढंग से क्वारंटाइन नहीं करता । वे बस नाश्ते, दोपहर और रात के खाने के लिए जाते हैं और बाकी समय खेतों में घर या बाहर रहते हैं। लेकिन उनमें से ज्यादातर लोग रातें केंद्र में ही बिताते हैं। अगर अचानक निरीक्षण हो तो क्या होगा? यह एक मजाक है।

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