2020 के लॉकडाउन के दौरान उत्तरी कर्नाटक के बीदर जिले में दोस्तों का एक ग्रुप एक कार्यक्रम में शामिल होने के लिए जंगल के रास्ते से गुजर रहा था। रास्ते में वे पानी पीने के लिए रुके। तभी एक बंदर सड़क पर आ गया। जब उस ग्रुप में से एक युवक ने थोड़ा पानी सड़क पर गिराया तो बंदर उसे चाटकर पीने लगा। यह देखकर उन्हें एहसास हुआ कि गर्मी की वजह से जंगली जानवरों को पानी की कितनी जरूरत होती है। इसी घटना से प्रेरित होकर उन्होंने गर्मियों की तेज गर्मी में जंगली जानवरों की मदद करने का तरीका खोजने का फैसला किया।
मिलिए ‘स्वाभिमानी गेलेयरा बालागा’के उन नौजवानों से, जो जंगलों में जानवरों और पक्षियों के लिए पानी के कुंड लगा रहे हैं और उनकी देखभाल कर रहे हैं।
बीदर में गर्मियों में तापमान 44 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। इसकी वजह से इस इलाके में पानी के मुख्य स्रोत सूख जाते हैं। औराद, भालकी और हुमनाबाद तालुकों में जमीन के नीचे का जल स्तर काफी नीचे चला गया है। बीदर दक्कन के पठार का भी एक हिस्सा है। यह मुख्य रूप से एक सूखा, पतझड़ी जंगल वाला इलाका है, जहां काले हिरण, लोमड़ियां, बंदर, तेंदुए, जंगली बिल्लियां, छिपकलियां और वाइपर जैसे कई जानवर पाए जाते हैं। यहां मोर, तीतर और चील जैसे कई पक्षी भी रहते हैं।
बंदर को देखकर हमारा दिल पसीज गया- चंद्रशेखर पदाशेट्टी
बालागा के अध्यक्ष चंद्रशेखर पदाशेट्टी ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया, “हमने जिस बंदर को देखा, वह सड़क पर गिरे पानी को चाटने की कोशिश कर रहा था, यह देखकर हमारा दिल पसीज गया। हमने इस समस्या का कोई हल निकालने का फैसला किया।”
बालागा की शुरुआत लगभग 12 साल पहले हुई थी, जब पदाशेट्टी कॉलेज में पढ़ते थे। 33 साल के पदाशेट्टी ने बताया, “शुरुआत में, हमारे क्लासमेट्स ने मिलकर इसे बनाया था और धीरे-धीरे दूसरे लोग भी इससे जुड़ने लगे। हमारा मुख्य मकसद सिर्फ पेड़ लगाना और जमीन के नीचे के जल स्तर को बढ़ाना था, क्योंकि बीदर एक सूखा-ग्रस्त इलाका भी है। अब तक हमने लगभग 16000 से 17000 पौधे लगाए हैं। उस घटना के बाद हमने जानवरों को खाना खिलाना भी शुरू कर दिया।”
बड़े-बड़े सीमेंट के कुंड रखने का फैसला किया
इस तरह बालागा ने जंगलों में कई जगहों पर पानी के बड़े-बड़े सीमेंट के कुंड रखने का फैसला किया, ताकि पक्षियों और जंगली जानवरों को पीने का पानी आसानी से मिल सके। जब ग्रुप के सदस्यों ने देखा कि उनके एक कुंड में एक छिपकली मरी पड़ी है, तो उन्होंने यह तय किया कि वे कुछ जगहों पर ऐसी जगह भी पानी रखेंगे, जहां कीड़े-मकोड़े भी सुरक्षित रूप से पहुंच सकें।
बलागा ने अपने 200 से ज्यादा सदस्यों में से 40 को जानवरों को पानी पिलाने के काम पर लगाया है। इसके सदस्यों में अब लेक्चरर, बिजनेसमैन और प्राइवेट कंपनियों में काम करने वाले लोग शामिल हैं। सभी सदस्यों को अपनी छतों पर किसी बर्तन या पात्र में पानी रखना जरूरी है।
जब तापमान अपने चरम पर होता है, तो बलागा के सदस्य हर दिन हौदों को पानी से भर देते हैं। पदाशेट्टी ने कहा, “हर हौद में 120 लीटर पानी आ सकता है। हमने इन्हें नागोरा, चिदरी, शाहपुर और निरनादा के जंगली इलाकों में बनवाया है। गर्मियों की शुरुआत में, हम इन हौदों को हर तीन दिन में एक बार फिर से भरते थे, लेकिन अब हम ऐसा हर दिन करते हैं। जानवर अपनी बात कह नहीं सकते, लेकिन हम इंसान उन बेजुबानों का दर्द समझ सकते हैं। इसलिए, हम यह काम कर रहे हैं।” जब बालागा के सदस्य 20-लीटर के डिब्बों में या कभी-कभी ट्रैक्टर में पानी लेकर आते हैं, तो जानवर और पक्षी उनके आने का इंतज़ार करते हैं।
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