ताज़ा खबर
 

‘मनरेगा’ से हासिल हुआ सिर्फ भ्रष्टाचार, 10 साल पूरे हो हुए आज, खर्च हुए 3.13 लाख करोड़ रुपए

गांव के हालात बदलने और लोगों के लिए रोजगार के अधिक अवसर प्रदान करने के उद्देश्य वाली महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के मंगलवार को 10 साल पूरे हो गए हैं।

Author नई दिल्ली | February 2, 2016 12:09 AM
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत काम करती महिलाएं। (फाइल फोटो)

महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के मंगलवार को 10 साल पूरे हो गए हैं। इस योजना पर अब तक 3.13 लाख करोड़ रुपए खर्च किए गए हैं, हालांकि उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, छत्तीसगढ़, मणिपुर जैसे कई राज्यों में इस योजना के कार्यान्वयन को लेकर भ्रष्टाचार और अनियमिताताओं की शिकायतें बाधक के रूप में उभरकर सामने आई हैं।

सूचना के अधिकार (आरटीआइ) के तहत ग्रामीण विकास मंत्रालय से मिली जानकारी के मुताबिक साल 2010-11 से 14 सितंबर 2015 के बीच करीब साढ़े पांच साल के दौरान देश के विभिन्न प्रदेशों में मनरेगा योजना के मद में 2.10 लाख करोड़ रुपए खर्च हुए। इस अवधि में केंद्र की ओर से 1.84 लाख करोड़ रुपए जारी किए गए। मनरेगा के कार्यान्वयन के लिए संपूर्ण खर्च केंद्र और राज्य सरकार करती हैं। इसमें केंद्र और राज्य की देनदारियों का निर्धारण मनरेगा अधिनियम की धारा 22 के प्रावधानों के मुताबिक किया जाता है। आरटीआइ के तहत मिली जानकारी के मुताबिक मनरेगा के कार्यान्वयन को लेकर विभिन्न राज्यों में भ्रष्टाचार और अनियमितताओं की शिकायतें मिलीं।

साल 2010 से 2015 की अवधि में मनरेगा को लेकर बिहार में कुल 249 शिकायतें मिलीं। इनमें 13 शिकायतें विशिष्ट प्रकृति की और 236 शिकायतें सामान्य प्रकृति की हैं। उत्तर प्रदेश में इस अवधि में लंबित शिकायतों की संख्या 263 दर्ज की गई। छत्तीसगढ़ में पिछले पांच सालों में मनरेगा में भ्रष्टाचार और अन्य अनियमितताओं की 70 शिकायतें मिली हैं। इनमें छह विशिष्ट प्रकृति की और 64 सामान्य प्रकृति की थीं। महाराष्ट्र में ऐसी 15 शिकायतें मिली हैं। इनमें एक विशिष्ट प्रकृति की और 14 सामान्य तरह की हैं। पश्चिम बंगाल में इस अवधि में मनरेगा के बारे में 20 शिकायतें मिलीं। गुजरात में मनरेगा की लंबित शिकायतों की संख्या 14 दर्ज की गई जबकि मणिपुर में 49 और पंजाब में 25 शिकायतें लंबित हैं।

ग्रामीण विकास मंत्रालय से साल 2010 से 2015 के बीच मनरेगा योजना के मद में आबंटन और खर्च के साथ विभिन्न राज्यों में इसके अनुपालन के संबंध में मिली शिकायतों का ब्योरा मांगा गया था। आरटीआइ के तहत प्राप्त जानकारी के मुताबिक मनरेगा के तहत वित्त वर्ष 2010-11 में 39377 करोड़ रुपए, 2011-12 में 37072 करोड़ रुपए, 2012-13 में 39778 करोड़ रुपए, 2013-14 में 38601 करोड़ रुपए, 2014-15 में 36043 करोड़ रुपए और 2015-16 में 14 सितंबर 2015 तक 18780 करोड़ रुपए खर्च किए गए।
मनरेगा के तहत देश के कई क्षेत्रों में काम ठेकेदारों के जरिए कराने की खबरों के बारे में एक सवाल के जवाब में मंत्रालय ने कहा कि मनरेगा का कार्य पंचायतों और अन्य कार्यक्रम कार्यान्वयन एजंसियों के मार्फत किया जाता है न कि ठेकेदारों के माध्यम से। मनरेगा के तहत मुख्य कार्य भूमि विकास और जल संरक्षण से संबंधित कार्य है। आरटीआइ के तहत यह पूछे जाने पर कि क्या मनरेगा के कारण उद्योगों और खेती के मजदूरों की उपलब्धता में कमी आई है, मंत्रालय ने कहा कि मनरेगा के कारण उद्योगों और कृषि क्षेत्र के लिए मजदूरों की उपलब्धता पर प्रभाव पड़ने के संबंध में कोई निर्णायक सबूत नहीं मिले हैं।

मंत्रालय ने कहा कि मनरेगा राज्यों की ओर से तैयार और क्रियान्वित किए जाते हैं। इसके लिए आवश्यकतानुसार स्टाफ और तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने का दायित्व राज्यों का है। मनरेगा के कार्यान्वयन के लिए तैनात कर्मचारियों के वेतन का भुगतान, कार्यक्रम के लिए केंद्र सरकार की ओर से दिए जाने वाले छह फीसद प्रशासनिक मद के तहत किया जा सकता है। मंत्रालय के बयान में कहा गया है कि मनरेगा के तहत आबंटित राशि का 71 फीसद पारिश्रमिक का भुगतान करने में व्यय हुआ। श्रमिकों में से अनुसूचित जाति के श्रमिकों की संख्या में 20 फीसद की वृद्धि दर्ज की गई जबकि अनुसूचित जनजाति के श्रमिकों की संख्या में 17 फीसद बढोत्तरी हुई। महिला श्रमिकों की संख्या में भी वृद्धि दर्ज की गई। इस कार्यक्रम के तहत 65 फीसद से ज्यादा काम कृषि और उससे जुड़ी गतिविधियों में हुआ।

 

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App