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डीयू के राजनीतिशास्त्र विभाग की तंगहाली

दिल्ली विश्वविद्यालय के एमए के विद्याथिर्यों को ताजा सत्र में उस वक्त झटका लगा जब उन्हें पता चला कि इस साल उन्हें एमए में अंतरानुशासन पत्र (इंटरडिस्पीलनरी पेपर) के तहत राजनीति विज्ञान का कोर्स नहीं मुहैया कराया जाएगा।

Author मृणाल वल्लरी | January 25, 2017 12:59 AM
दिल्ली विश्वविद्यालय का कला संकाय (आर्ट्स फैकल्टी)

दिल्ली विश्वविद्यालय के एमए के विद्याथिर्यों को ताजा सत्र में उस वक्त झटका लगा जब उन्हें पता चला कि इस साल उन्हें एमए में अंतरानुशासन पत्र (इंटरडिस्पीलनरी पेपर) के तहत राजनीति विज्ञान का कोर्स नहीं मुहैया कराया जाएगा। मंगलवार को बहुत से परेशानहाल छात्रों ने इस बाबत राजनीतिशास्त्र विभाग से भी संपर्क किया। अंग्रेजी साहित्य के तीसरे सत्र के विद्यार्थी गौरव ने कहा कि ऐसा राजनीतिशास्त्र के अलावा बहुत से विषयों में भी हो रहा है। लेकिन राजनीतिशास्त्र विभाग ने पहले यह स्पष्ट नहीं किया कि वह कोर्स मुहैया नहीं करा पाएगा। हमारे फॉर्म और फोटो वगैरह लेने के बाद आखिरी समय में बताया जा रहा है कि यह कोर्स हमें नहीं मिलेगा। जब विभाग के पास कोर्स मुहैया कराने की क्षमता नहीं थी तो फिर हमें उलझाए क्यों रखा? विद्यार्थियों ने कहा कि यह उनके विकल्प चुनने के अधिकार का हनन है। डीयू को नए तरह का कोर्स तैयार करने के पहले अपने संसाधनों के बारे में पता कर लेना चाहिए था। विवि की तंगहाली और नाकामियों का नतीजा विद्यार्थी भुगत रहे हैं। विद्यार्थियों का आरोप है कि अंतरानुशासन पत्र के तहत राजनीतिशास्त्र के विकल्प को खत्म किया जा रहा है।

वहीं डीयू की राजनीतिशास्त्र की विभागाध्यक्ष नमिता बेहरा ने इस बात को गलत बताया कि अंतरानुशासन पत्र के तहत राजनीतिशास्त्र का विकल्प खत्म कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों की बड़ी संख्या और संसाधनों की कमी के कारण सिर्फ इस सत्र के लिए कोर्स को रोका गया है। नमिता बेहरा का कहना है कि इस बार हमारे पास अपने ही विभाग के 500 विद्यार्थी हैं और उसके बाद अंतरानुशासन पत्र के लिए 135 विद्यार्थियों ने आवेदन किया। हम वर्तमान संसाधनों के साथ इतनी भारी संख्या में विद्यार्थियों को यह कोर्स पूरा करा पाने की स्थिति में नहीं थे, इसीलिए इसे महज इस सत्र के लिए रोका है। बेहरा का कहना है कि विभाग जल्द ही इस मसले पर रायमशविरा कर एक गाइडलाइन तैयार करेगा। लेकिन उन्होंने आश्वासन दिया कि राजनीतिशास्त्र में यह कोर्स खत्म नहीं किया जाएगा।

अंग्रेजी साहित्य में तीसरे वर्ष के छात्र अश्वेत ने कहा कि पाठ्यक्रम तैयार करते वक्त तो दिल्ली विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय मानको और वैश्विक प्रतियोगिता की बात करता है। लेकिन जहां तक संसाधनों की बात है तो हम कहीं से भी नहीं कह सकते कि यह अंतरराष्ट्रीय स्तर का केंद्रीय विश्वविद्यालय है। स्नातकोत्तर के विद्यार्थियों को भी आप संसाधन का हवाला देकर उनकी पसंद के विषय से वंचित कर देते हैं। अंतरराष्ट्रीय कोर्स और साख की बात करने वाले डीयू के संसाधन उसे आईना दिखा रहे हैं। यह सिर्फ राजनीतिशास्त्र का मामला नहीं है।

अश्वेत ने कहा कि उन्होंने अंग्रेजी साहित्य के साथ अंतरानुशासन पत्र के लिए पंजाबी साहित्य को चुना है जो उन्हें मिल गया है। लेकिन बहुत से ऐसे कोर्स हैं जो विद्यार्थियों को इसलिए मुहैया नहीं करवाए जा रहे हैं कि आपके पास पर्याप्त संख्या में कक्षाएं और शिक्षक नहीं हैं। स्नातकोत्तर स्तर पर अंतरानुशासन पत्र पढ़ाए जाने की अवधारणा यह थी कि हर विषय का अपना एक अनुशासन और सिद्धांत होता है। नौवीं-दसवीं तक विषय की अवधारणा का ज्ञान हासिल कर लेने के बाद विद्यार्थी विशेष पाठ्यक्रम ही पढ़ते हैं। स्नातकोत्तर में यही आपका विषय हो जाता है। अगर आप अनुसंधान करते हैं तो ज्ञान के अन्य अनुशासन के साथ संपर्क आपके ज्ञान को समृद्ध करता है। विभिन्न अनुशासनों के ज्ञान में एक आंतरिक संबंध होता है। इतिहास का विद्यार्थी अगर साहित्य को एक स्रोत के रूप में पढ़ेगा तो उसके अनुसंधान को नया आयाम मिलेगा। उसी तरह साहित्य का विद्यार्थी अगर राजनीतिशास्त्र के अनुशासन को जानेगा तो उसे अपने विषय की बेहतर समझ होगी। लेकिन यह कोर्स प्रशासनिक कागजों पर ही अच्छी व्याख्या पाता है। डीयू के संसाधनों की जमीनी हकीकत के सामने यह दम ही तोड़ रहा है।

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