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म्यांमा सीमा पर नया संचालन अड्डा बनाएगा गृह मंत्रालय

‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल व आंतरिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियां : मूल्यांकन व प्रतिक्रिया तंत्र’ विषय पर गृह मंत्रालय से जुड़ी प्राक्कलन समिति के समक्ष अधिकारियों ने बताया कि सीमा की निगरानी करने वाले बल की गतिविधियां और संपर्क बढ़ाने के लिए गृह मंत्रालय में भारत-म्यांमा सीमा पर सड़कों, हेलीपैड के निर्माण सहित आधारभूत संरचना के विकास की परियोजना तैयार की जा रही है।’
केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह।(फाइल फोटो)

भारत-म्यांमा सीमा के आर-पार विद्रोही गतिविधियों, गोला बारूद व तस्करी की चुनौती से निपटने के लिए गृह मंत्रालय ने म्यांमा सीमा के पास एक ‘नया संचालन अड्डा’ स्थापित करने की योजना बनाई है। ‘केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल व आंतरिक सुरक्षा संबंधी चुनौतियां : मूल्यांकन व प्रतिक्रिया तंत्र’ विषय पर गृह मंत्रालय से जुड़ी प्राक्कलन समिति के समक्ष अधिकारियों ने बताया कि सीमा की निगरानी करने वाले बल की गतिविधियां और संपर्क बढ़ाने के लिए गृह मंत्रालय में भारत-म्यांमा सीमा पर सड़कों, हेलीपैड के निर्माण सहित आधारभूत संरचना के विकास की परियोजना तैयार की जा रही है।’  अधिकारियों के अनुसार, समिति ने कहा इस संबंध में जल्द फैसला लेने पर जोर दिया ताकि जरूरी आधारभूत संरचना का शीघ्र निर्माण किया जा सके। भारत-म्यांमा सीमा पर हो रही अवैध गतिविधियों की रोकथाम जरूरी है।

दरअसल, मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम और अरुणाचल प्रदेश तक फैली भारत-म्यांमा सीमा की विशेषता वहां का पहाड़ी क्षेत्र, घने जंगल और जलाशय हैं। भारत-म्यांमा सीमा के दोनों ओर रहे रहे स्थानीय निवासियों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक व जनजातीय संबंध होने के कारण इस क्षेत्र में ‘मुक्त आवाजाही’ की व्यवस्था व सुविधा उपलब्ध है। इसके कारण दोनों ओर के निवासियों को सीमा के दोनों ओर 16 किलोमीटर तक के क्षेत्र में आवाजाही की अनुमति है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि इसके अलावा खराब सड़क संपर्क और अवसंरचना की कमी के कारण भारत-म्यांमा सीमा पर अवैध रूप से सीमा पार करने मामलों, विद्रोही गतिविधियों, शस्त्र व गोला बारूद सहित अवैध माल की तस्करी की संभावनाएं अधिक है और यह सुरक्षा बलों लिए बड़ी चुनौती है। समिति ने अपनी सिफारिशों में यह भी कहा है कि परिचालनात्मक क्षेत्रों में अपनी जरूरत के अनुसार हर केंद्रीय सुरक्षा बल को पास के देशों की विदेशी भाषा और उक्त राज्य की स्थानीय भाषा संबंधी बुनियादी पाठ्यक्रम शुरू करना चाहिए।

समिति के अध्यक्ष मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि देश की उत्तरी सीमा पर तैनात केंद्रीय अर्द्धसैनिक बलों को तिब्बती व चीन में बोली जाने वाली मंडारिन भाषा सीखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि हाल ही में तवांग में चीन से लगी सीमा पर कुछ पर्चे मिले थे और वहां तैनात कर्मियों को यह पता नहीं लगा कि इसमें क्या लिखा है। इसमें चीन की ओर से दावा किया गया था कि वह उनका इलाका है। जोशी ने कहा कि ऐसे में सीमा पर तैनात कर्मियों को पास के देश की भाषा और तैनात वाली राज्य की स्थानीय भाषा सीखनी चाहिए।

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