अमृतसर-खेमकरण सड़क पर पंजाब के तरन तारन जिले में चीमा गांव के बाहर बना एक स्मारक 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध की उस निर्णायक लड़ाई की याद दिलाता है, जब असल उत्तर के मैदान में पाकिस्तानी टैंकों का बड़ा बख्तरबंद हमला भारतीय सैनिकों के सामने आकर रुक गया था। इस लड़ाई में 4 ग्रेनेडियर्स के सैनिकों ने असाधारण साहस दिखाया। इनमें कंपनी क्वार्टर मास्टर हवलदार अब्दुल हामिद का नाम सबसे आगे आता है, जिन्होंने दुश्मन के कई टैंकों को निशाना बनाया और अंततः अपनी जान गंवा दी। उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च सैन्य सम्मान परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया।

हर साल सितंबर में इस स्मारक पर उन सैनिकों को याद किया जाता है जिन्होंने असल उत्तर की लड़ाई में सर्वोच्च बलिदान दिया। 4 ग्रेनेडियर्स की कार्रवाई से जुड़ी एक और घटना का भी उल्लेख मिलता है, जिसमें पाकिस्तानी तोपखाने के कमांडर ब्रिगेडियर एआर शमी के मारे जाने की बात कही जाती है। हालांकि, इसी प्रसंग में पाकिस्तान की प्रथम बख्तरबंद डिवीजन के जीओसी मेजर जनरल नसीर अहमद खान के मारे जाने का दावा भी किया जाता रहा है, लेकिन इस दावे के समर्थन में ठोस प्रमाण बहुत कम मिलते हैं।

भारतीय और पाकिस्तानी सेना के अधिकारियों द्वारा लिखे गए विभिन्न वृत्तांतों ने 10 सितंबर, 1965 के उस दुर्भाग्यपूर्ण दिन की घटनाओं पर पर्याप्त प्रकाश डाला है, फिर भी घटनाक्रम के बारे में एक गलत धारणा बनी हुई है।

एक पाकिस्तानी ब्रिगेडियर की मौत

अपनी पुस्तक “द वे इट वाज: इनसाइड द पाकिस्तान आर्मी” में घुड़सवार सेना अधिकारी ब्रिगेडियर जेडए खान लिखते हैं कि पाकिस्तानी सेना के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ ने 10 सितंबर को ब्रिगेडियर शमी और 5वीं बख्तरबंद ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर बशीर अहमद को आगे बढ़कर टोही अभियान चलाने का आदेश दिया था, क्योंकि वे 1वीं बख्तरबंद डिवीजन की धीमी प्रगति से नाराज थे। उन्होंने निर्णय लिया कि चीमा पर कब्जा 24वीं घुड़सवार सेना और 5वीं फ्रंटियर फोर्स रेजिमेंट द्वारा किया जाना चाहिए।

इस योजना को अमल में लाने के लिए 5वीं बख्तरबंद ब्रिगेड के कमांडर डिवीजनल आर्टिलरी कमांडर और ब्रिगेड को सहायता प्रदान कर रहे एसपी फील्ड रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर खेमकरण-भिक्कीविंड रोड पर आगे बढ़े। उन पर घात लगाकर हमला किया गया और डिवीजनल आर्टिलरी कमांडर ब्रिगेडियर शमी शहीद हो गए। 24वीं कैवलरी रेजिमेंट की रिजर्व स्क्वाड्रन ने घात स्थल को खाली कराने की कोशिश की, लेकिन पैदल सेना के अभाव में वे ऐसा नहीं कर सके।

इस हमले की खबर फैल गई और सैनिक पीछे हटने लगे, जिससे अभियान ठप हो गया। ब्रिगेडियर खान लिखते हैं, “खेमकरण से गुजरते हुए, प्रथम बख्तरबंद डिवीजन के जीओसी ने प्रथम सशस्त्र बल को कस्बे को खाली कराने का आदेश दिया और अंततः यह कार्य पूरा हो गया।”

इस विवरण से स्पष्ट है कि ब्रिगेडियर शमी की मृत्यु के दिन जीओसी (कमांड ऑफिसर) जीवित थे और कार्रवाई में सक्रिय थे। इससे पहले 9 सितंबर को 6 लांसर्स रेजिमेंट के कमांडिंग ऑफिसर लेफ्टिनेंट कर्नल साहिबजादा गुल, वाल्टोहा के पास अपने टैंक के बुर्ज पर खड़े होकर भारतीय ठिकानों का निरीक्षण करते समय गोली लगने से मारे गए। दूसरे-इन-कमांड मेजर आईबी खान ने कमान संभालने से इनकार कर दिया और स्क्वाड्रन कमांडरों में से कोई भी स्थिति को संभालने के लिए आगे नहीं आया। ब्रिगेडियर खान कहते हैं, “6 लांसर्स रेजिमेंट पंगु हो गई। 24 कैवलरी भूरे कुहना की ओर बढ़ी। वहां भारतीय गोलाबारी के कारण कमांडिंग ऑफिसर बेहोश हो गए और यह रेजिमेंट भी नियंत्रण से बाहर हो गई।”

रेडियो संदेश जिसने इस गलत धारणा को बढ़ावा दिया

लेफ्टिनेंट कर्नल गुल या ब्रिगेडियर बशीर की हत्या से अगले दिन भारतीय सैनिकों द्वारा पकड़े गए रेडियो संदेश की व्याख्या हो सकती है, जिसमें कहा गया था, “बारा इमाम मारा गया (वरिष्ठ अधिकारी मारा गया है)”। चूंकि ब्रिगेडियर शमी और ब्रिगेडियर बशीर की गोलीबारी एक ही दिन हुई थी, इसलिए यह अनुमान लगाया जा सकता है कि प्रथम बख्तरबंद डिवीजन के जीओसी भी टोही अभियान पर थे और मारे गए या गंभीर रूप से घायल हुए लोगों में शामिल थे।

24वीं कैवलरी रेजिमेंट के रिजर्व स्क्वाड्रन कमांडर मेजर (बाद में कर्नल) समीउद्दीन का प्रत्यक्षदर्शी विवरण भी मौजूद है। वह असल उत्तर के करीब तक आगे बढ़ चुके थे और ब्रिगेडियर शमी को जीप में सवार होकर भीखीविंड जाने वाली सड़क पर जोश भरे अंदाज में पहुंचते हुए देख रहे थे।

पाकिस्तानी सैन्य इतिहासकार मेजर आगा अमीन के साथ एक पॉडकास्ट में कर्नल समीउद्दीन ने बताया कि ब्रिगेडियर शमी ब्रिगेडियर बशीर को अपने साथ ले गए और उनसे पूछा कि सामने कुछ भी न होने के बावजूद सैनिक आगे क्यों नहीं बढ़ रहे हैं। मेजर समी का कहना है कि गोलीबारी उनकी आंखों के सामने नहीं हुई, लेकिन उन्होंने बताया कि ब्रिगेडियर बशीर मामूली चोटों के साथ बच निकलने में कामयाब रहे। उन्होंने बताया कि उन्होंने ब्रिगेड कमांडर को अपने एक टैंक पर बिठाया और खेमकरण में पीछे की ओर ले गए।

ब्रिगेडियर ज़ेडए खान ने यह भी उल्लेख किया है कि प्रथम बख्तरबंद डिवीजन के जीओसी और चौथी और पाँचवीं बख्तरबंद ब्रिगेड के कमांडरों को 11 सितंबर को उनके पदों से हटा दिया गया था और उनके अधिकतर स्टाफ अधिकारियों का तबादला कर दिया गया था। इस प्रकार, पाकिस्तानी विवरणों से पता चलता है कि पाकिस्तानी जीओसी न केवल 11 सितंबर को, कथित तौर पर युद्ध में मारे जाने या गंभीर रूप से घायल होने के एक दिन बाद, नए आदेश दे रहे थे, बल्कि उन्हें उसी दिन कमान से बर्खास्त भी कर दिया गया था।

सिग्नल कोर का इतिहास लिखने वाले मेजर जनरल (सेवानिवृत्त) वी.के. सिंह ने 9 और 10 सितंबर को 7वीं ब्रिगेड सिग्नल कंपनी के कमांडिंग ऑफिसर मेजर नरेश रस्तोगी द्वारा बताई गई घटनाओं का विवरण दिया है। मेजर रस्तोगी कहते हैं कि 10 सितंबर को यह जानकारी मिली कि पाकिस्तानी कमांडरों को उम्मीद थी कि दिल्ली जाने वाला रास्ता साफ होगा और वे बख्तरबंद वाहनों से सुरक्षित जीपों में हरिके तक पहुंचने के लिए आगे बढ़ रहे थे।

मेजर रस्तोगी आगे बताते हैं कि उसी शाम रेडियो पाकिस्तान ने उनके जीओसी को हिलाल-ए-जुर्रत से सम्मानित किए जाने की घोषणा की। वे आगे बताते हैं कि ब्रिगेडियर शमी शहीद हो गए और उनकी जीप उनके शव के साथ उनके ऑपरेशन ऑर्डर और पूरी तरह से चिह्नित तोपखाने के नक्शे के साथ जब्त कर ली गई। वे कहते हैं, “एक अन्य कमांडर का शव, संभवतः बख्तरबंद ब्रिगेड कमांडर का, ले जाया गया था।”

यहां भी ब्रिगेडियर बशीर की हत्या के बारे में अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन मेजर रस्तोगी ने इस विवरण में जीओसी 1 आर्मर्ड डिवीजन की हत्या के बारे में कुछ नहीं कहा है।

तत्कालीन पश्चिमी सेना कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने अपनी पुस्तक ‘ए सोल्जर रिमेम्बर्स’ में लिखा है कि 10 सितंबर को दोपहर लगभग 2:30 बजे, भारतीय सेना की तोपखाने की एक निगरानी चौकी ने दुश्मन से एक वायरलेस संदेश प्राप्त किया जिसमें कहा गया था कि पाकिस्तान का मंडल कमांडर आगे सड़क के रास्ते आ रहा है, यह पता लगाने के लिए कि अग्रिम कार्रवाई में देरी का कारण क्या है।

लेफ्टिनेंट जनरल हरबख्श सिंह ने लिखा, “हमारी तरफ से दल का स्वागत करने की तैयारी चल रही थी, और पूरी तरह से क्षतिग्रस्त जीप में सवार जनरल ऑफिसर कमांडिंग और उनके साथ मौजूद अन्य अधिकारी या तो मारे गए या घायल हो गए। घायल जनरल ऑफिसर कमांडिंग पाकिस्तानी डिवीजन को पाकिस्तानी बख्तरबंद सेना ले गई, जबकि हमने घटनास्थल से उनके साथ मौजूद गनर ऑफिसर, उनके आर्टिलरी ब्रिगेड कमांडर, ब्रिगेडियर एआर शम्मी का शव, उनकी टोपी और निजी डायरी बरामद की। अगले दिन जब मैं घटनास्थल पर मौजूद था, और मेरे कहने पर, उनके शव का मैदान में सैन्य सम्मान के साथ अंतिम संस्कार किया गया।”

शिव कुणाल वर्मा ने अपनी उत्कृष्ट पुस्तक ‘1965: ए वेस्टर्न सनराइज’ में 4 ग्रेनेडियर्स द्वारा ब्रिगेडियर शमी की हत्या के घात लगाकर किए गए हमले का वर्णन किया है। हालांकि, वे यह भी बताते हैं कि दूसरा ब्रिगेडियर बच निकला। वर्मा लिखते हैं, “सदमे में डूबा और स्तब्ध बशीर, चमत्कारिक रूप से बिना किसी चोट के, जीप से रेंगकर बाहर निकला और पास के गन्ने के खेत में गायब हो गया।”

वह आगे बताते हैं कि उसी दिन बाद में एक पाकिस्तानी रेडियो संदेश को इंटरसेप्ट किया गया – ‘बड़ा इमाम मारा गया’। इसे प्रथम बख्तरबंद डिवीजन के जीओसी, मेजर जनरल नसीर अहमद की हत्या के रूप में समझा गया।

मेजर आगा अमीन के शब्दों में, ब्रिगेडियर शमी युद्ध की अफरा-तफरी में दिशाहीन हो जाने और यह मानकर कि वह अपनी सेना के कब्जे वाले क्षेत्र में हैं, बहुत आगे बढ़ जाने के कारण मारे गए।

मेजर जनरल नसीर के लिए कोई आंसू नहीं बहाए गए

उपरोक्त विवरणों से यह स्पष्ट होता है कि युद्ध के दौरान लगाए गए कई अनुमान गलत साबित हुए, जैसा कि बाद के रिकॉर्ड से पता चलता है। हालांकि, अपमानित मेजर जनरल नसीर के लिए किसी ने आंसू नहीं बहाए, क्योंकि वे अपनी डिवीजन में ज्यादा लोकप्रिय नहीं थे।

ब्रिगेडियर जेड ए खान का कहना है कि 1965 में मेजर जनरल नसीर लगभग तीन वर्षों से डिवीजन की कमान संभाल रहे थे, लेकिन डिवीजन से सहयोग और सम्मान प्राप्त करने में विफल रहे थे।

खान के अनुसार, मेजर जनरल नसीर मुखबिरों पर निर्भर रहने वाले जनरल के रूप में जाने जाने लगे। उनके नेतृत्व में, उपकरणों के रखरखाव में कमी आई और जब डिवीजन युद्धकालीन स्थिति की ओर बढ़ रहा था, तब सैकड़ों वाहन सड़कों पर खराब हो गए। कई अन्य वाहन गैरेज में ही छोड़ दिए गए क्योंकि वे सड़क पर चलने लायक नहीं रह गए थे।

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वह 6 सितंबर 1965 की तारीख थी, जब भारतीय सेना ने तड़के लाहौर पर तीन तरफ से हमला कर पाकिस्तानी सेना को करारा झटका दिया था। दो दिन बाद 8 सितंबर को पठानकोट-जम्मू अक्ष से सियालकोट पर भी धावा बोला गया। लाहौर पर यह हमला जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की घुसपैठ का करारा जवाब था। इसने पाकिस्तानी सेना को पूरी तरह हैरान कर दिया। यह वही साहसिक कार्रवाई थी जिसकी उम्मीद पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान को बिल्कुल नहीं थी। पाकिस्तान मानता था कि भारत केवल जम्मू और कश्मीर में जवाबी कार्रवाई करेगा। पूरी खबर पढ़ने के लिए यहां पर करें क्लिक