UP News: मेरठ के प्रसिद्ध सेंट्रल मार्केट के ध्वस्तीकरण का मामला आज पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बना हुआ है। यह विवाद कोई एक दिन की घटना नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें साल 1989 तक जाती हैं। पिछले साढ़े तीन दशकों में यह प्रकरण भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अनियमितताओं और राजनीतिक हीला-हवाली का केंद्र बना रहा।
अब जब मामला देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के अंतिम फैसले तक पहुंच चुका है, तो नियमों के तहत ध्वस्तीकरण की कार्रवाई प्रशासन के लिए एक कानूनी अनिवार्यता बन गई है। इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका पर विपक्षी दलों ने सवाल उठाए, लेकिन जमीनी हकीकत इसके उलट है।
योगी सरकार ने किया समाधान निकालने का प्रयास
सरकार का दावा है कि मुख्यमंत्री ने शुरुआत से ही व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए व्यावहारिक समाधान निकालने का प्रयास किया। सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों के साथ हुई बैठक में मुख्यमंत्री ने संकट से बचने के लिए तीन स्पष्ट विकल्प दिए थे:
पहला विकल्प: व्यापारी स्वयं सरकार के साथ मिलकर न्यायालय में पक्षकार बनें, ताकि उनका कानूनी पक्ष और मजबूती से रखा जा सके।
दूसरा विकल्प: आवास विकास विभाग द्वारा निर्धारित ‘कंपाउंडिंग शुल्क’ जमा कर निर्माण को नियमों के तहत वैध बनाने की प्रक्रिया अपनाई जाए।
तीसरा विकल्प: यदि सुप्रीम कोर्ट का रुख सख्त रहता है, तो मार्केट खाली कर सरकार की पुनर्वास योजना को स्वीकार किया जाए, जिसका पूरा खर्च राज्य सरकार उठाने को तैयार थी।
सहमति न बनने से फंसा कानूनी पेंच
मुख्यमंत्री द्वारा दिए गए इन उदार प्रस्तावों के बावजूद, व्यापारियों के बीच इन विकल्पों पर आम सहमति नहीं बन सकी। आपसी तालमेल की कमी और कानूनी पेच के कारण मामला पूरी तरह न्यायालय के विवेक पर निर्भर हो गया। अंततः सुप्रीम कोर्ट ने कानून के कड़े प्रावधानों का हवाला देते हुए ध्वस्तीकरण का आदेश सुनाया, जिसके बाद प्रशासन के हाथ कानून से बंध गए हैं।
पिछली सरकारों के ‘संरक्षण’ ने बिगाड़ा खेल
इस मामले के राजनीतिक पहलू पर नजर डालें तो पूर्ववर्ती सरकारों की भूमिका संदिग्ध रही है। आरोप हैं कि जनता दल, समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के कार्यकाल के दौरान इन अवैध निर्माणों को न केवल नजरअंदाज किया गया, बल्कि कई स्तरों पर अप्रत्यक्ष संरक्षण भी दिया गया। विशेष रूप से वर्ष 2013 से 2017 के बीच जब नियमों को ताक पर रखकर धड़ल्ले से निर्माण कार्य हुए, तब मौजूदा विपक्ष सत्ता में था। आज वही दल अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर वर्तमान सरकार पर निशाना साध रहे हैं।
सवालों के घेरे में ‘PIL’ की भूमिका
इस विवाद में लोकेश खुराना जैसे कुछ व्यक्तियों की भूमिका भी विवादों में रही है। उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वे जनहित याचिकाओं (PIL) के माध्यम से ऐसे संवेदनशील मामलों में हस्तक्षेप करते हैं। चर्चा है कि इन याचिकाओं का उद्देश्य जनहित कम और निजी लाभ या दबाव बनाना अधिक रहा है, जिसने व्यापारियों की समस्याओं को सुलझाने के बजाय और उलझा दिया।
प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती
वर्तमान स्थिति यह है कि सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट आदेश के बाद ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया को टालना लगभग असंभव है। इसके बावजूद, राज्य सरकार प्रशासनिक स्तर पर अब भी ऐसे रास्तों की तलाश में है, जिससे प्रभावित व्यापारियों को अधिकतम राहत मिल सके। दशकों पुराना यह विवाद अब अपने अंतिम मुकाम पर है, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों को संभालना योगी सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।
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