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दिल्ली मेरी दिल्ली: मर्यादा का उल्लंघन

एक महिला निगम पार्षद ने तो पुरुष पार्षदों पर अश्लील इशारे करने तक का आरोप लगाकर सदन की मर्यादा पर सवाल खड़ा कर दिया है।

भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी और दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल की फाइल फोटो।

विधानसभा की देखा-देखी दिल्ली नगर निगम में भी पार्षदों ने लात-घूंसे चलाना और एक-दूसरे पर जूता फेंकना शुरू कर दिया है। इतना ही नहीं, एक महिला निगम पार्षद ने तो पुरुष पार्षदों पर अश्लील इशारे करने तक का आरोप लगाकर सदन की मर्यादा पर सवाल खड़ा कर दिया है। यह वाकया हुआ पूर्वी नगर निगम के सदन की एक अहम बैठक में। बेदिल ने जब बैठक में मौजूद एक पार्षद से पूछा कि आप लोग लात-घूंसे और उससे भी निचले स्तर तक कैसे चले गए तो उनका जवाब सुनने लायक था। वे सदन की मर्यादा को लेकर अपनी दलील रखने लगे और कहा कि दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है, लेकिन उस पार्टी के पार्षद निगम में अपनी मनमर्जी चलाना चाहते हैं। ‘आप’ पार्षद मानते हैं कि निगम दिल्ली सरकार के पैसे से चलता है लिहाजा इस तरह की घटनाएं सामने आ रही हैं। अब यह पुलिस का काम है कि वह कानून के मुताबिक कार्रवाई करे। जब उनसे पूछा गया कि महिलाओं पर अश्लील फब्तियां कसने का क्या मतलब है तो उनसे कोई जवाब देते नहीं बना।

कशमकश में जिंदगी
दिल्ली और दिल्लीवासियों को इसकी विशेष प्रशासनिक और राजनीतिक स्थिति के कारण कई तरह की विपरीत परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है और उस पर प्रदूषण का कहर भी झेलना पड़ता है। दो सरकारों के बीच फंसी दिल्ली के लोग अपने घरों के पास पड़े कचरे के ढेर की सफाई के लिए किस सरकार के पास जाएं इसे लेकर वे पशोपेश में रहते हैं। शहर का मौसम भी लोगों को कम परेशान नहीं करता, पहाड़ों पर बारिश होती है या बर्फ गिरती है तो दिल्ली में ठंड बढ़ जाती है। इसी तरह पड़ोसी राज्यों में पराली जलने के कारण दिल्ली की हवा खराब हो जाती है और प्रदूषण का खतरा गहरा जाता है। इस बार भी ठंड और प्रदूषण की आंख-मिचौली जारी है। लोग समझ ही नहीं पा रहे कि सुबह कितने कपड़े पहनकर घर निकलें कि दोपहर में गर्मी न लगे और रात को घर लौटते वक्त ठंड न लगे। कमोबेश यही हाल प्रदूषण का है, लोग समझ ही नहीं पा रहे कि उन्हें कब तक इस दमघोंटू हवा में सांस लेने को मजबूर होना पड़ेगा।

आगे किसान, पीछे वाम
बीते दिनों संसद मार्ग पर हुई किसानों की रैली में खेती-किसानी के अलावा और भी कई मुद्दे बहस के केंद्र में थे। मंच से मुद्दे की बात हुई और मंच के पीछे आयोजन की चर्चा। मसलन दिल्ली पुलिस के रवैये, रैली की व्यवस्था, खानपान का इंतजाम, अनुशासन वगैरह-वगैरह। शुरुआत हुई दो महीने पहले भी दिल्ली घेरने आए किसानों की बात से। किसी ने कहा कि दिल्ली पुलिस ने उनकी अच्छी खातिरदारी की थी। किसी ने लाठी तो किसी ने आंसू गैस के गोले के किस्से बताए। इस बार भी वही किसान हैं, लेकिन वे तो संसद मार्ग पर मंच पर विराजमान हैं, यह कैसे? जवाब भी उन्ही में से एक ने दिया कि फर्क दरअसल आयोजकों का था। इस रैली के आयोजक वामपंथी जो ठहरे। फिर वो आगे क्यों नहीं आए? तो जवाब था मिला कि आगे आ जाते तो फिर यह रैली किसानों की कैसे होती। और मंच पर राहुल या केजरीवाल कैसे आते। किसी ने ठीक ही कहा, रैली भले ही किसानों के नाम पर थी, लेकिन उसके पीछे पूरा वाम खड़ा था, लिहाजा अनुशासन तो होना ही था।

चुप्पी का चलन
दिल्ली के ज्यादातर जिला पुलिस उपायुक्त अक्सर किसी बड़ी वारदात के बाद मौन धारण कर लेते हैं। इसके ठीक उलट जब ये अधिकारी किसी वाहन चोर या शराब तस्कर को पकड़ते हैं या किसी हल्के मामले को सलुझाते हैं तो कई पन्नों की प्रेस विज्ञप्ति भेज देते हैं। कहीं कोई हत्या या फिर कोई अन्य संगीन वारदात हो जाए तो अधिकारी घंटों तक चुप्पी साधे रहते हैं और नजर भी नहीं आते हैं। ऐसा ही एक वाकया पिछले दिनों देखने को मिला, जब एक रेस्तरां में संदिग्ध हालत में एक युवक की मौत हो गई और पुलिस इस बात में उलझी रही कि यह हत्या है या फिर आत्महत्या। यह कोई पहला मौका नहीं था। इससे पहले भी जिला पुलिस उपायुक्त इस तरह की मुश्किल में उलझते रहे हैं।

आधी-अधूरी तैयारी
अधूरी तैयारी के साथ नियम लागू करने में नोएडा प्राधिकरण का कोई मुकाबला नहीं है। प्राधिकरण अधिकारियों ने स्वच्छ भारत अभियान के तहत शहर को खुले में शौच मुक्त बनाने के लिए उल्लंघन करने वालों पर जुर्माना तय कर दिया है। खुले में पेशाब करने पर 100 रुपए और शौच करने पर 200 रुपए का जुर्माना लगाया गया है। उल्लंघन करने वालों की धरपकड़ के लिए टीम भी बनाई जाएगी। स्वच्छ भारत अभियान के तहत शहर में 84 हाई क्लास सार्वजनिक शौचालय बनाए गए हैं। विज्ञापन आधारित शौचालयों को केवल उन्हीं जगहों पर बनाया गया है, जो आबादी से ज्यादा विज्ञापन के लिहाज से उपयुक्त हैं। ये शौचालय रात 10 बजे बंद हो जाते हैं। औद्योगिक महानगर में काफी संख्या में कारखानों से श्रमिक 9 बजे या उसके बाद छूटते हैं। ऐसे में वे इन शौचालयों का इस्तेमाल कैसे करेंगे, इसका जवाब कोई नहीं दे पा रहा है।

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