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जिंदा वोटरों नहीं, मुरदों से तय होगी हार-जीत

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में वोटर क्या लगातार चौथी बार हाथ का साथ देंगे या अबकी इलाके के इस दूसरे राज्य में भी असम की तर्ज पर ही कमल खिलाएंगे?

मणिपुर में इलेक्शन के दौरान बढ़ी सुरक्षा

पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर में वोटर क्या लगातार चौथी बार हाथ का साथ देंगे या अबकी इलाके के इस दूसरे राज्य में भी असम की तर्ज पर ही कमल खिलाएंगे? लाख टके के इस सवाल का जवाब तलाशने की कवायद शनिवार को पहले चरण में राज्य की 60 सदस्यीय विधानसभा की 38 सीटों के लिए मतदान के साथ शुरू होगी। बाकी 22 सीटों के लिए दूसरे व आखिरी चरण में आठ मार्च को वोट पड़ेंगे। इस बीच, पहले चरण में राज्य की चूड़ाचांदपुर शायद देश की अकेली ऐसी सीट है जहां मुर्दे ही तय करेंगे कि इलाके के 53 हजार लोगों के वोट किसकी झोली में जाएंगे। चुनाव आयोग ने इस उग्रवादग्रस्त और सवा सौ दिनों से आर्थिक नाकेबंदी से जूझ रहे राज्य में पहले चरण के मतदान की तमाम तैयारियां पूरी कर ली हैं। इस दौर में इंफल पूर्व, इंफल पश्चिम, कांग्पोक्पी, बिशेनपुर औरर चूड़ाचांदपुर जिले की इन 32 सीटों के लिए 168 उम्मीदवार मैदान में हैं। सुरक्षा के लिहाज से आर्थिक नाकेबंदी की चपेट में आने वाले दोनों हाइवे की सुरक्षा के लिए अर्धसैनिक बलों की 30 कंपनियां तैनात रहेंगी और मतदान केंद्रों पर ढाई सौ कंपनियां।

राष्ट्रीय राजनीति में खास अहमियत नहीं रखने वाला यह छोटा-सा पर्वतीय राज्य अबकी 15 साल से यहां राज कर रही कांग्रेस और उसे चुनौती देने वाली भाजपा दोनों के लिए बेहद अहम बन गया है। इस चुनाव में इन दोनों दलों का काफी कुछ दांव पर है। इबोबी सिंह की अगुवाई में कांग्रेस जहां अबकी जीत कर लगातार चौथी बार चुनाव जीत कर एक नया रिकार्ड बनाने का प्रयास कर रही है, वहीं उसे कड़ी चुनौती देने वाली भाजपा असम के बाद इलाके के इस दूसरे राज्य में लोकतांत्रिकतरीके से सत्ता पर काबिज होने का सपना देख रही है। पार्टी की ओर से चुनाव प्रचार के लिए यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अलावा गृह मंत्री राजनाथ सिंह के पहुंचने और पार्टी प्रमुख अमित शाह के कई दिनों तक डेरा डाले रहने से साफ है कि भाजपा के लिए इस राज्य की कितनी अहमियत है।

पहले दौर में चूड़ाचांदपुर सीट अकेली ऐसी सीट है जहां मुर्दे ही इलाके के 53 हजार वोट तय करेंगे। दरअसल, वर्ष 2015 मे इबोबी सिंह सरकार ने बाहरी लोगों की आवाजाही पर अंकुश लगाने के लिए इनर लाइन परमिट से संबंधित तीन विधेयक पारित किए थे। उसके खिलाफ भड़की हिंसा के दौरान पुलिस फायरिंग में इलाके के नौ युवकों की मौत हो गई थी। उनमें से आठ के शव उसी समय से स्थनीय अस्पताल के मुर्दाघर में जस के तस रखे है। एक शव का उसके परिजनों ने बीते साल दिसंबर में अंतिम संस्कार कर दिया था। इलाके के लोगों का कहना है कि जब तक इस मामले के दोषियों को सजा नहीं मिल जाती तब तक उन शवों का अंतिम संस्कार नहीं किया जाएगा। यहां पैती जनजाति के लोग बहुतायत में हैं। कांग्रेस के खिलाफ उनकी नाराजगी को ध्यान में रखते हुए ही पार्टी ने अबकी यहां किसी को मैदान में नहीं उतारा है। वैसे, कांग्रेस के पूर्व स्थानीय विधायक फुंग्जाथांग तोनसिंग अबकी नेशनल पीपुल्स फ्रंट (एनपीपी) के टिकट पर मैदान में हैं। बीते साल इबोबी सिंह ने उनको मंत्रिमंडल से हटा दिया था।

यहां उनका सीधा मुकाबला भाजपा के वी हांग्खालियान से है। राज्य का यह सबसे विकसित पर्वतीय शहर एक मणिपुर राजा के नाम पर बसा है। यह मणिपुर के सबसे बड़े विधानसभा क्षेत्रों में भी शुमार है। एनपीपी उम्मीदवार तोनसिंग कहते हैं कि मैंने कांग्रेस से नाता तोड़ लिया है। इलाके के लोग तीन बार मुझे यहां से जिता चुके हैं। अबकी भी वे मेरा ही समर्थन करेंगे। दूसरी ओर, भाजपा का दावा है कि अबकी लोग उसका समर्थन करेंगे। भाजपा उम्मीदवार हांग्खालियान कहते हैं कि पार्टी भले बदल ली हो, तोनसिंग मूल रूप से हैं तो कांग्रेसी ही। शहरी इलाका होने के कारण ड्रेनेज, पेयजल की सप्लाई और संकरी सड़कें स्थानीय मुद्दे के तौर पर उभरी हैं। लेकिन असली मुद्दा तो वर्ष 2015 की फायरिंग में मारे गए युवकों के शव ही हैं। इलाके के लोग आर्थिक नाकेबंदी से भी नाराज हैं।

अबकी चुनाव अभियान के दौरान इरोम शर्मिला के मैदान में उतरने से सशस्त्र बल विशेषधाकिर अधिनियम के प्रमुख मुद्दे के तौर पर उभरने का अंदेशा था। लेकिन आर्थिक नाकेबंदी तमाम मुद्दों पर भारी साबित हुई। सत्ता के दोनों दावेदार यानी कांग्रेस और भाजपा सियासी फायदे के लिए अपने अभियान के दौरान इस नाकेबंदी के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते रहे हैं। भाजपा ने सत्ता में आने के बाद मणिपुर को भ्रष्टाचार मुक्त, बंद-मुक्त और नाकेबंदी-मुक्त राज्य बनाने का भरोसा दिया है। दूसरी ओर, कांग्रेस का चुनाव अभियान नगा समझौते की आड़ में मणिपुर की क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने और विकास की गति तेज करने के इर्द-गिर्द सिमटा रहा है। अब राज्य के लोग किसके वादों पर भरोसा जताते हैं यह तो चुनावी नतीजों से ही पता चलेगा। फिलहाल पहले दौर के चुनाव से पहले दोनों दावेदार अपनी-अपनी जीत के दावे करते नहीं थक रहे हैं।

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