किर्गिस्तान की रहने वाली नरगिसा कई सालों से सिरोसिस से जूझ रही थीं। उनकी सेहत लगातार बिगड़ रही थी और डॉक्टरों ने परिवार को बताया था कि लिवर ट्रांसप्लांट ही उनके बचने का सबसे अच्छा तरीका है।
लेकिन लिवर ट्रांसप्लांट करवाना आसान काम नहीं है। भारत में डोनर से लिवर ट्रांसप्लांट के लिए इंतजार करना बहुत अनिश्चित होता है, डोनर की भारी कमी के कारण इंतजर का समय कई महीनों से लेकर सालों तक हो सकता है। यहां तक कि जिंदा व्यक्ति से ट्रांसप्लांट के लिए भी कड़े नियम होते हैं। डोनर का करीबी रिश्तेदार होना, मेडिकल रूप से मैच करना, बीएमआई 30 से कम होना और सर्जरी के बाद मरीज की जरूरत पूरी करने के लिए लिवर का आकार काफी बड़ा होना जरूरी है।
लीवर दान करने को तैयार हो गया बेटा
परिवार महीनों तक इस बात को लेकर परेशान रहा कि क्या वे इन मुश्किलों को पार कर पाएंगे। फिर एक अच्छी खबर मिली। नरगिस के 26 साल के बेटे हुमायूं का लिवर मैच कर गया। वह बिना किसी हिचकिचाहट के अपने लिवर का एक हिस्सा दान करने के लिए तैयार हो गए। इसके बाद एक ऐसा सफर शुरू हुआ जिसमें वैसी उम्मीद थी जैसी परिवार सालों की अनिश्चितता के बाद रखते हैं। हुमायूं ने अपनी कजिन गुजल को फोन किया, जो साकेत के मैक्स हॉस्पिटल में विदेशी मरीजों के साथ काम करती हैं और एक दशक से ज्यादा समय से भारत में रह रही हैं।
जल्द ही सारी व्यवस्थाएं हो गईं। नरगिस, हुमायूं और उनकी 75 साल की दादी मखपिरात दिल्ली के लिए फ्लाइट में सवार हुईं, इस उम्मीद के साथ कि वे जल्द ही नरगिस के ठीक होने पर घर लौटेंगे। गुजल ने कहा, “सर्जरी सफल रही। परिवार के लिए यह वही पल था जिसका उन्हें बेसब्री से इंतजार था।”
चार दिन तक ही चला चमत्कार
शनिवार को नरगिस को मैक्स हॉस्पिटल से छुट्टी मिल गई। हॉस्पिटल के सामने सड़क के उस पार, वे ‘फ्लोरिश स्टेज बी एंड बी’ में रुके, परिवार के तीनों सदस्य तीसरी मंजिल पर बने कमरे नंबर 303 में रहने लगे। गुजल बताती हैं कि परिवार ने वे दिन घर पर रिश्तेदारों को फोन करने और उन्हें यह भरोसा दिलाने में बिताए कि सर्जरी अच्छी तरह से हो गई है। हालांकि, यह चमत्कार सिर्फ चार दिन तक ही चला। बुधवार सुबह, शॉर्ट सर्किट की आशंका के चलते इमारत में आग लग गई। आग में मारे गए 21 लोगों में नरगिस, हुमायूं और मखपिरात भी शामिल थे।
अब गुजल एम्स की मॉर्चरी के बाहर खड़ी हैं और अपने रिश्तेदारों के शव लेने का इंतजार कर रही हैं। गुजल कहती हैं, “उन्होंने मुझे सुबह 8:53 बजे फोन किया। उन्होंने बताया कि होटल में आग लग गई है और वह चिल्ला रही थीं। फिर फोन कट गया। दो मिनट बाद मैंने उन्हें वापस फोन किया, लेकिन उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।” घबराई हुई गुजल ने एक दोस्त को उनका हाल जानने के लिए भेजा।
गुजल ने बताया, “तब तक इमारत में आग लग चुकी थी। मैं भी सुबह 10 बजे तक वहां पहुंच गई। मैंने पुलिस वालों से गुजारिश की कि वे तीसरी मंजिल पर जाएं और उन्हें बाहर निकालें। उन्होंने मुझसे कहा, ‘मैम, अभी तो पहली मंजिल खाली कराई जा रही है।’ जो मैं देख रही थी, उस पर मुझे यकीन ही नहीं हो रहा था।”
जब इमारत से शव आने लगे, तो गुजल ने हुमायूं और फिर नरगिस को देखा। गुजल कहती हैं, “उन्हें पहली मंजिल से बाहर निकाला गया था। शायद वे खुद को बचाने के लिए नीचे की तरफ भागे होंगे। नरगिस के गले में अभी भी एक स्लिंग बैग लटका हुआ था। मुझे लगता है कि उस समय भी उन्होंने पासपोर्ट और कुछ कैश इकट्ठा करने की कोशिश की होगी।”
गुजल दस साल पहले भारत आईं थीं
गुजल बेहतर मौकों की तलाश में लगभग दस साल पहले किर्गिस्तान से भारत आई थीं। मैक्स हॉस्पिटल में विदेशी मरीजों के साथ काम करने की वजह से, उन्होंने नरगिस के इलाज और दिल्ली में उनके रहने की व्यवस्था में व्यक्तिगत रूप से मदद की थी। अब नरगिस के ठीक होने की तैयारी करने के बजाय, गुजल तीन शवों को किर्गिस्तान वापस ले जाने की व्यवस्था कर रही हैं। वह कहती हैं, “मैंने अभी परिवार को सूचना दी है। वे गहरे सदमे में हैं। जो कुछ हुआ है, उससे हम सभी बुरी तरह हिल गए हैं।”
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दिल्ली सरकार ने मालवीय नगर अग्निकांड में जान गंवाने वाले मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपये और गंभीर रूप से घायलों को पांच-पांच लाख रुपये की अनुग्रह राशि देने की घोषणा की। हौज रानी इलाके में स्थित ‘फ्लोरिश स्टे बी एंड बी’ होटल में बुधवार को भीषण आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई थी जिनमें से 12 विदेशी नागरिक हैं। यहां क्लिक कर पढ़ें पूरी खबर…
