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मालविका सरूकई ने कहा नृत्य भी एक भाषा है

मालविका सरूकई का कहना है कि शास्त्रीय नृत्य की सतत प्रवाहमान परंपरा है।
मालविका सरूकई

मालविका सरूकई का कहना है कि शास्त्रीय नृत्य की सतत प्रवाहमान परंपरा है। वह कहती हैं कि एक जीवंत और महान परंपरा में बदलाव, सहज प्रक्रिया है। गुरु ने जो सिखाया, उसे दो दशक करती रही। लेकिन, बाद में मेरे मन में सवाल उठने लगे कि क्या परंपरा और परिवर्तन साथ-साथ नहीं चल सकते। मेरे घर का खुला, सक्रिय, सरल माहौल रहा है।
मैंने अपनी मां से सवाल पूछा कि क्या मैं भरतनाट्यम के परंपरागत नृत्य विषय-वस्तु के अलावा, नृत्य नहीं कर सकती। फिर, मैं कुछ संस्कृत विद्वानों के संपर्क में आई। उस क्रम में मैंने संस्कृत रचनाओं पर नई नृत्य रचनाओं को पेश किया। मेरी तमिल विद्वानों से बातचीत हुई।

उनसे मुझे समृद्ध तमिल साहित्य के बारे में पता चला और लगातार कोशिश करके मैंने उन्हें नृत्य रचनाओं में पिरोया। तब मैंने महसूस किया कि भरतनाट्यम नृत्य सिर्फ एक नृत्य शैली या एक परंपरा मात्र नहीं है। वास्तव में, भरतनाट्यम नृत्य अपने-आप में एक पूर्ण भाषा है, जो इसे प्रस्तुत करने वाले यानी नृत्यांगना और रसिक दर्शक के बीच संवाद का जरिया बनता है। मुझे लगता है कि नृत्य के लिए साहित्य के शब्द ही सब कुछ नहीं हैं। मुझे लगता है कि शब्द नृत्य के लिए केंद्रीय तत्व नहीं हैं। ऐसे में ही मैंने भरतनाट्यम की आवाज को अपने अंदर महसूस किया है। मैं परंपरा में विश्वास करती हूं। परंपरा का आदर करती हूं, इसके जरिए मैंने अपने नृत्य प्रस्तुति को विस्तार दिया है।

नृत्यांगना मालविका मानती हैं कि नृत्य में आध्यात्मिक प्रेम की अनुभूति होती है। मुझे लगता है, अलग-अलग भक्त की भक्ति का अलग-अलग रंग है। भक्ति जब उच्च पराकाष्ठा पर पहुंचती है तब सभी की भक्ति भावना एक जैसी ही प्रतीत होती है। वह रंगविहीन होती है। एक पल के लिए वह स्वतंत्र होती है, वह एक क्षण का जादू है, वह एक क्षण का तिरोहन है, वह मेरे लिए महत्वपूर्ण है। उस वक्त मुझे नृत्य करते हुए, लगता है कि सिर्फ मैं उस स्थान विशेष पर नृत्य नहीं कर रही हूं। बल्कि, वह स्थान विशेष मेरे साथ नृत्य कर रहा है। मैं एक साथ शांति और स्वरों के साथ नृत्य कर रही हूं। उस समय एक-एक गतियां मेरे लिए मूल्यवान हो जाती हैं। तब मुझे लगता है कि जैसे मेरे साथ गाने वाला अपने सुर को तानपुरे के सुर के साथ जिस तरह संयोजित कर रहा है, वैसे ही मेरे अंग-प्रत्यंग की थिरकन शरीर रूपी तंबूरे के साथ सुर मिला रही है।

युवाओं को संदेश में मालविका कहती हैं कि मुझे लगता है, हम जब युवा थे, तब इतना दबाव नहीं था, जितना आज के युवा कलाकारों पर है। उन्हें स्थायी सहयोग की जरूरत है। मध्यम दर्जे के बजाय विशिष्ट प्रतिभा वाले कलाकारों को चुनकर, उन्हें आगे बढ़ाने का प्रयास किया जाना चाहिए। युवा कलाकारों को सीखते समय शुरुआत में जो गुरु सिखाएं, उसका पूर्ण अनुकरण करना चाहिए। कुछ सालों बाद, अपनी खुद के व्याकरण का विकास करना चाहिए। उसके बाद, खुद की तलाश करनी चाहिए कि उनका मन क्या चाहता है? वह अपनी कला या अपने-आप से क्या चाहते हैं? क्योंकि कला की यात्रा अनंत है। सफल होने के लिए आपको लगातार प्रेरित होने की जरूरत पड़ती है।

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