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फौजी अंबावडे: महाराष्‍ट्र के इस गांव के हर घर में एक फौजी, नाम के पीछे अनूठी कहानी

ग्रामीण कहते हैं कि मुगलों की सेना को खदेड़ने के लिए हमारे गांव के बहादुर लोगों ने कई बार छत्रपति शिवाजी के लिए लड़ाई लड़ी। देशभक्ति यहां के लोगों की रग-रग में है।

तस्वीर का प्रयोग प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (Photo: PTI)

महाराष्ट्र के रैगड़ जिले में एक गांव है ‘फौजी अंबावडे’। इस गांव में करीब 300 परिवार रहते हैं और हर घर में एक फौजी है। यह सिलसिला आज से नहीं बल्कि जमाने से चला आ रहा है। पहले यहां के लोग ब्रिटिश इंडियन आर्मी में थे और अब इंडियन आर्मी में हैं। गांव के नाम के पीछे भी अनूठी कहानी है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, 1974 से 1994 के बीच गांव के सरपंच रहे वासुदेव पवार यहां के इतिहास के बारे में बताते हैं, “16 सदी से ही हमारा गांव अपनी बहादुरी की वजह से जाना जाता रहा है। मुगलों की सेना को खदेड़ने के लिए हमारे गांव के बहादुर लोगों ने कई बार छत्रपति शिवाजी के लिए लड़ाई लड़ी। देशभक्ति यहां के लोगों की रग-रग में है। करीब 300 पूर्व सैनिक यहां रहते हैं और इतनी ही संख्या में यहां के युवक इंडियन आर्मी में हैं।”

पवार आगे कहते हैं, “गांव के कुछ परिवार पुणे और मुंबई रहने चले गए। ऐसे में मुझे पूरी संख्या याद नहीं है लेकिन हाल ही में कोल्हापुर में हुई रैली भर्ती के दौरान गांव के दो युवकों ने सभी टेस्ट पास किया और मराठा पैदल सेना में भर्ती हुए। कुछ सप्ताह में वे मराठा सैनिक बन जाएंगे।” वर्ष 1981 तक इस गांव का नाम ‘अंबावडे’ था। इसके बाद तत्कालीन मुख्यमंत्री एआर अंतुल्य ने गांव का नाम बदलकर ‘फौजी अंबावडे’ कर दिया क्योंकि गांव के प्रत्येक घर से एक व्यक्ति फौज में थे।

गांव का रिकॉर्ड यह बताता है कि फौजी अंबावडे गांव के 565 सैनिक आजादी के बाद से देश के लिए लड़ाई लड़े हैं। वर्ष 2000 तक गांव में 27 जूनियर कमीशंड ऑफिसर, 9 मानद कप्तान और वीरता पदक विजेता थे। इनमें से एक को सेना पदक भी मिला था। गांव के लोग यह भी कहते हैं कि हमारे पूर्वजों ने प्रथम विश्व युद्ध और द्वितीय विश्व युद्ध में लड़ाई लड़ी थी तथा उन्हें अंग्रेजों से सम्मान भी मिला था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान मेसोपोटामिया (इराक) में लड़ते हुए 111 सैनिक शहीद हुए थे, जिनमें से पांच इस गांव के थे। उन पांच शहीदों की याद में गांव में स्मारक भी बना हुआ है।

इसी तरह गांव के कई अन्य सैनिकों के बारे में भी ग्रामीण अक्सर चर्चा करते हैं। गांव के रहने वाले 11वीं कक्षा के छात्र आकाश पवार कहते हैं, “हमारे गावं के युवक दूसरे क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए सोचते भी नहीं हैं। हमारे गांव का एक समृद्ध इतिहास रहा है। हमें इस पर गर्व है। मैं भी फौजी बन देश की सेवा करना चाहता हूं।” हालांकि, गांव के पूर्व सैनिकों की मांग है कि जिस तरह से गोरखा के लिए शरीर की ऊंचाई में छूट दी जाती है, उसी तरह यहां के लोगों को भी छूट दी जाए।

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