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वक्त के पहिए को घुमा स्कूल जा रहीं दादी और नानी, बुजुर्ग महिलाओं को शिक्षित करता एक स्कूल

स्कूल का लक्ष्य गांव की बुजुर्ग महिलाओं को शिक्षित करना है।

Author ठाणे | February 20, 2017 12:57 AM
दादी नानियों ने स्कूल जाना शुरू किया। (PTI Photo)

गुलाबी पोशाक पहने, कंधे पर बस्ता टांगे कांता मोरे हर सुबह अपने स्कूल जाती हैं और नर्सरी की उन कविताओं का अभ्यास करती हैं जिसे उन्होंने पहले सीखा था। स्कूल में दिन की शुरुआत वह अपनी कक्षा के 29 छात्रों के साथ प्रार्थना से करती हैं और फिर अपने स्लेट पर चौक से मराठी में आड़े तिरछे अक्षरों को लिखने की कोशिश करती हैं। किसी प्राथमिक स्कूल में ऐसे दृश्य आम हो सकते हैं, लेकिन यहां एक अंतर है। ये सभी विद्यार्थी 60 से 90 साल की उम्र के हैं। कांता और उनके दोस्त यहां के फांगणे गांव स्थित दादी नानियों के स्कूल ‘आजीबाईची शाला’ में पढ़ते हैं, जहां वे प्राथमिक शिक्षा ग्रहण करती हैं और गणित, अक्षरज्ञान व उनके सही उच्चारण के साथ नर्सरी कवितओं का अभ्यास करती हैं। 45 वर्षीय योगेंद्र बांगड़ ने वक्त के पहिए को फिर से घुमाने की पहल शुरू की। स्कूल का लक्ष्य गांव की बुजुर्ग महिलाओं को शिक्षित करना है। गांव का मुख्य पेशा खेती है। फांगणे जिला परिषद प्राथमिक स्कूल के शिक्षक बांगड़ ने मोतीराम चैरिटेबल ट्रस्ट के साथ मिल कर यह पहल शुरू की। मोतीराम चेरिटेबल ट्रस्ट इन महिलाओं को स्कूल के लिए गुलाबी साड़ी, स्कूल बैग, एक स्लेट और चॉक पेंसिल जैसे जरूरी सामान के साथ कक्षा के लिए श्यामपट्ट उपलब्ध कराता है। शुरू में स्कूल जाने में हिचकने वाली कांता अब मराठी में पढ़-लिख सकती हैं। वह कहती हैं कि शिक्षित होने से वह आत्मनिर्भर महसूस कर रही हैं। उन्होंने कहा, ‘शुरू -शुरू में मैं शर्माती थी और हिचकिचाती थी, लेकिन जब मैंने अपनी उम्र और उससे अधिक की महिलाओं के शाला में पढ़ने आने की बात जानी तो फिर मैंने भी अपने फैसले पर आगे बढ़ी। अब मैं अपनी भाषा में पढ़-लिख सकती हूं।’ रोचक बात  यह है कि कांता को उनकी बहू शीतल पढ़ाती हैं। शीतल स्कूल में शिक्षिका हैं। अक्षरज्ञान कराने के अलावा शीतल इन सभी को मराठी के महान संतों के लिखे पद और भजन पढ़ना भी सिखाती हैं। इतना ही नहीं स्कूल परिसर को हरा भरा रखने के लिए हर छात्र ने अपने नाम पर एक पौधा लगाया है, जिसे हर दिन वे पानी से सींचते हैं।

बांगड़ ने जब यह पाया कि गांव की करीबन हर बुजुर्ग महिला अशिक्षित है और वे शिवाजी जयंती पर ऐतिहासिक काव्यों को पढ़ने में अक्षम हैं, तो पिछले साल उन्हें शाला खोलने का खयाल आया।उन्होंने कहा, ‘मैंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षित करना मेरा कर्तव्य है। ट्रस्ट से मुझे शुरुआती रकम मिलने के बाद एक परिवार ने स्कूल के लिए अपनी जमीन का छोटा हिस्सा दे दिया और इस तरह पिछले साल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर 28 दादी नानियों के साथ हमारी ये यात्रा शुरू हुई।’ बांगड़ हर रोज स्कूल आने जाने के लिये 75 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं। उन्होंने कहा, ‘अगर सरकार हमारे छात्रों को कोई छात्रवृत्ति देती है तो यह उत्साहवर्द्धक होगा। अगर राज्य के अन्य हिस्सों में भी ऐसी पहल को दोहराया जाता है तो यह एक क्रांतिकारी कदम होगा।’ उन्होंने दावा किया कि इस पहल से गांव को सौ फीसद साक्षरता हासिल करने में मिली है। महिलाओं के बीच शिक्षा से स्वच्छता और सफाई को लेकर जागरूकता बढ़ी है और इसके कारण गांव खुले में शौचमुक्त गांव बन गया है। उन्होंने कहा, ‘गांव में हर परिवार ने अपने अपने घरों में शौचालय बनाया है।’

 

 

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