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1993 मुंबई धमाके: दो को हुई फांसी, पर अबू सलेम को नहीं, जानिए क्‍यों

इस मामले में बराबर का गुनहगार होने के बावजूद अबू सलेम फांसी के फंदे से बच गया। इसकी वजह है भारत और पुर्तगाल के बीच प्रत्यर्पण संधि की वो शर्तें जिसके तहत अबू सलेम को पुर्तगाल से भारत लाया गया था।
टाडा कोर्ट में मौजूद अबू सलेम (EXPRESS FILE PHOTO)

1993 के मुंबई बम धमाकों में फैसला आ गया है। विशेष टाडा कोर्ट ने अबू सलेम को हथियारों की डिलीवरी का दोषी मानते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई है। अबू सलेम ने गुजरात से हथियार लाए और मुंबई में इसे दूसरे दोषियों को सौंपा। अदालत ने इसी केस में फिरोज खान और ताहिर मर्चेंट को फांसी की सजा सुनाई गई है। फिरोज खान को साजिश रचने और हत्या का दोषी पाया गया था। ताहिर मर्चेंट का धमाके की साजिश में शामिल रहने का दोषी पाया गया है। टाडा कोर्ट का माना कि मुस्तफा डोसा, अबू सलेम, ताहिर मर्चेंट और फिरोज खान मुख्य इस कांड के मुख्य साजिशकर्ता थे। इस मामले में बराबर का गुनहगार होने के बावजूद अबू सलेम फांसी के फंदे से बच गया। इसकी वजह है भारत और पुर्तगाल के बीच प्रत्यर्पण संधि की वो शर्तें जिसके तहत अबू सलेम को पुर्तगाल से भारत लाया गया था।

अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम का खास गुर्गा अबू सलेम मुंबई का एक खूंखार नाम था। इसका काम बॉलीवुड से पैसे की उगाही तो था ही दाऊद के खास कामों के लिए ये हथियार इकट्ठा करता था। बंबई दंगों के बाद नफरत में जल रहे दाऊद इब्राहिम ने जब बंबई में धमाकों का प्लान बनाया तो उसके लिए अबू सलेम उसका राइट हैंड बन गया। धमाकों को अंजाम देने के बाद अबू सलेम भारत से फरार हो गया। लेकिन बंबई धमाकों के 11 साल बाद 2002 में हिन्दुस्तान के अखबार तब अबू सलेम की खबरों से भर गये जब पुर्तगाल में सलेम की गिरफ्तारी की खबर आई। इंटरपोल ने 20 सितंबर 2002 को एफबीआई की मदद से अबू सलेम को अरेस्ट किया। एफबीआई ने उस सैटेलाइट फोन के जरिये सलेम की लोकेशन पता कर ली जिसका इस्तेमाल वो कर रहा था। सलेम के साथ उसकी गर्लफ्रेंड मोनिका बेदी भी गिरफ्तार कर ली गई।

भारतीय एजेंसियों के लिए एक बड़ा मौका था। सीबीआई समेत कई एजेंसियां अबू सलेम के प्रत्यर्पण में जुट गईं। लेकिन अबू सलेम को भारत लाने में सबसे बड़ी बाधा थी पुर्तगाल का कानून। पुर्तगाल में किसी भी शख्स को मौत की सजा नहीं दी जाती है। चूंकि अबू सलेम की गिरफ्तारी पुर्तगाल में हुई थी इसलिए उस पर भी पुर्तगाल का ही कानून लागू होता था। भारत की सरकार ने जब पुर्तगाल को लिखित आश्वासन दिया कि भारत में उसे मौत की सजा नहीं दी जाएगी तो ही उसे पुर्तगाल भारत को सौंपने पर राजी हुआ। आखिरकार 2005 में अबू सलेम का पुर्तगाल से भारत प्रत्यर्पण किया गया।

सीबीआई के सूत्रों के मुताबिक अबू सलेम का अपराध भी रेयरेस्ट ऑफ द रेयर की श्रेणी में आता था और अगर पुर्तगाल के साथ करार ना हुआ होता तो उसे भी मौत की सजा मिली रहती। लेकिन भारत सरकार ने पुर्तगाल के कानून का सम्मान करते हुए अबू सलेम को आजीवन कारावास की ही सजा सुनाई। यही नहीं अबू सलेम को 25 साल से ज्यादा वक्त तक कारावास में नहीं रखा जा सकेगा।

 

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