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रोज लगता है कि घर लौटेंगे पापा

उनके सर्वोच्च बलिदान पर हमारे परिवार को गर्व है।’ वैशाली आंबले ने कहा, ‘नौ साल बीत गए, लेकिन ऐसा एक दिन नहीं बीता, जब हमने उनको याद न किया हो।

Author मुंबई | November 26, 2017 3:36 AM
मुंबई 26/11 हमले में 166 लोग मारे गए थे और करीब 300 घायल हुए थे। (File Photo)

मुंबई हुए आतंकी हमले को भले ही नौ वर्ष बीत गए हों लेकिन पाकिस्तानी आतंकी अजमल कसाब को पकड़ने के प्रयास में सर्वोच्च बलिदान देने वाले पुलिस उपनिरीक्षक तुकाराम आंबले के परिवार को लगता है कि वे घर लौटेंगे। हमले की बरसी से पहले उनकी बेटी वैशाली आंबले नम आंखों से अपने पिता को याद करते हुए कहती हैं, ‘हमें हमेशा लगता है कि पापा किसी भी क्षण घर लौट जाएंगे, हालांकि हमें यह पता है कि वह अब कभी नहीं आएंगे।’ एमएड की पढ़ाई कर चुकी वैशाली शिक्षिका बनना चाहती हैं। उन्होंने कहा, ‘हम अक्सर यह सोचा करते हैं कि पापा ड्यूटी पर गए हैं और वे घर लौट आएंगे। हमने उनके सामानों को घर में उन्हीं जगहों पर रखा है जहां वे पहले रहते थे। उनके सर्वोच्च बलिदान पर हमारे परिवार को गर्व है।’ वैशाली आंबले ने कहा, ‘नौ साल बीत गए, लेकिन ऐसा एक दिन नहीं बीता, जब हमने उनको याद न किया हो।’ वैशाली अपनी मां तारा और बहन भारती के साथ वर्ली पुलिस कैंप में रहती हैं। भारती राज्य सरकार के जीएसटी विभाग में अधिकारी हैं।

मुंबई हमले के समय यह पुलिस उपनिरीक्षक तुकाराम आंबले का अदम्य साहस था जिसकी बदौलत पाकिस्तानी आतंकवादी अजमल कसाब पकड़ा जा सका। निहत्थे आंबले ने मुंबई के गिरगांव चौपाटी में भारी हथियारों से लैस कसाब की राइफल को पकड़ लिया और मरते दम तक उसे नहीं छोड़ा। कसाब को पकड़ने की कोशिश में उन्हें कई गोलियां लगीं और उनकी मौत हो गई। आंबले ने अपना सर्वोच्च बलिदान दिया पर उनकी वजह से बाकी पुलिसकर्मियों को इतना समय मिल गया कि वे कसाब को पकड़ सकें। मुंबई हमले की पहली बरसी पर भारत सरकार ने 26 नवंबर 2011 को शांतिकाल में दिए जाने वाले सर्वोच्च वीरता सम्मान अशोक चक्र से सम्मानित किया।

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