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कामकाज के दम पर नहीं, बल्कि इन दो कारणों से महाराष्‍ट्र निकाय चुनाव में लहाराया है भाजपा का झंडा

जिन आठ महानगरपालिकाओं में भाजपा ने जीत हासिल की है उनमें से केवल नागपुर और अकोला में ही उसकी दावेदारी पहले से मजबूत थी।

Author February 24, 2017 12:12 PM
maharashtra municipal elections, BJP, congress, municipal election maharashtra, NCP, shivsena, BJP maharashtra, BJP municipal election, pune municipal election 2016, maharashtra civic polls 2016महाराष्‍ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फड़ऩवीस और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह।

गिरीश कुबेर

गुरुवार (23 फरवरी) को महाराष्ट्र की 10 महानगरपालिकाओं के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की धमाकेदार जीत को राज्य और केंद्र पार्टी नेता अपने कामकाज की इस जीत की बड़ी वजह बता रहे हैं लेकिन जमीनी सच्चाई थोड़ी अलग है। 10 में से आठ महानगरपालिकाओं में जीत हासिल हासिल करने वाली भाजपा ने जीत का सबसे बड़ा कारण “आयातित” उम्मीदवार बने हैं। ऐसा लगता है कि पार्टी ने इन चुनावों के लिए दो स्तरीय रणनीति बना रखी थी, एक “चुनाव जिताऊ” उम्मीदवार चुनो और दूसरा, “जहां पार्टी में ऐसा उम्मीदवार न हो वहां दूसरे के जिताऊ उम्मीदवार को अपने में मिला लो।” लगता है कि भाजपा ने “चुनाव जिताऊ” उम्मीदवार को पहले से भांप लेने की “कला” सीख ली है जो एक जमाने में कांग्रेस की ताकत मानी जाती थी।

मसलन पुणे का उदाहरण ले लें जहां भाजपा ने शरद पवार की एनसीपी को हराकर महानगरपालिका (पीएमसी) पर कब्जा जमाया है। पीएमसी में भाजपा के लिए जीत हासिल करने वाले आधे से ज्यादा उम्मीदवार एनसीपी, कांग्रेस या शिव सेना से पार्टी में आए थे। यही हाल पिंपरी चिंचवाड महानगरपालिका (पीसीएमसी) का रहा। भाजपा ने पीसीएमसी भी एनसीपी से छीना है। यहां भी भाजपा ने पार्टी की कमान एनसीपी के एक पूर्व नेता के हाथ में सौंपी थी। इस नेता ने एनसीपी के अजित पवार के करीबियों को पार्टी में शामिल करवाया।

भाजपा की इस रणनीति का शिकार केवल एनसीपी नहीं हुई। मसलन नासिक को ही ले लें। राज ठाकरे की मनसे के कब्जे वाली नासिक महानगरपालिका (एनएमसी) पर झंडा लहराने के लिए भाजपा ने मनसे की लगभग पूरी जिलाई इकाई को फोड़ लिया और जीत हासिल करने में कामयाब रही। अमरावती महानगरपालिका (एएमसी) में भी भाजपा की जीत का श्रेय कांग्रेस और एनसीपी के पुराने नेताओं से हाथ मिलाने के बाद ही मिली है।

उल्हासनगर महानगरपालिका (यूएमसी) में भी भाजपा की यही कहानी रही। राष्ट्रीय राजधानी में अपराध और अपराधियों की विरोधी होने का दावा करने वाली भाजपा ने यूएमसी पर नियंत्रण हासिल करने के लिए स्थानीय माफिया पप्पु कलानी से हाथ मिलाने में जरा भी संकोच नहीं किया। भाजपा के स्वर्गीय नेता गोपीनाथ मुंडे ने एक जमाने में शरद पवार को कलानी की सरपरस्ती के लिए काफी घेरा था इस चुनाव में कलानी के हाथ में कमल का फूल था।

जिन आठ महानगरपालिकाओं में भाजपा ने जीत हासिल की है उनमें से केवल नागपुर और अकोला में ही उसकी दावेदारी पहले से मजबूत थी। नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) का मुख्यालय होने के साथ ही, महाराष्ट्र के मौजूदा मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़नवीस और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी का गृह जिला है। वहीं विदर्भ के अकोला में भाजपा का पहले से ही मजबूत दखल रहा है।

भाजपा ने करीब 25 साल बाद महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव शिव सेना से अलग होकर लड़ा। पार्टी को इसका फायदा भी मिला। देश के सबसे अमीरा महानगर पालिका बीएमसी में भाजपा की सीटों में करीब 300 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। भाजपा मुंबई में शिव सेना से कुछ सीट पीछे रही गयी तो इसकी वजह थी स्थानीय संगठन का पर्याप्त मजबूत न होना। यही हाल थाणे महानगरपालिका में भी रहा जहां शिव सेना अपने मजबूत संगठन के बल पर जीत हासिल करने में कामयाब रही।

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