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दाऊद के एक फैसले से हिल गया था छोटा राजन, एक मर्डर के लिए अस्‍पताल घुसे थे 24 शूटर्स, 500 राउंड चलीं गोलियां

मुंबई में जब डॉन दाऊद इब्राहिम का सिक्का चलता था तो छोटा राजन नंबर-2 हुआ करता था। दाऊद और छोटा राजन की दोस्ती की कहानी फिल्मी अफसाने की तरह है। लेकिन 1988 खत्म होते-होते इस दाऊद गैंग में एंट्री होती है शकील अहमद उर्फ छोटा शकील की। ये शख्स भी अपने करतूतों की वजह से दाऊद की गुड बुक्स में आ गया।

अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम और छोटा राजन। (फाइल फोटो)

हिन्दुस्तान में अपराध की दुनिया के खतरनाक किरदारों में से एक छोटा राजन को पत्रकार जे डे मर्डर केस में मकोका कोर्ट ने उम्रकैद की सजा सुनाई है। मुंबई पुलिस की फाइलों में अभी भी उसके गुनाह कई नाम से दर्ज हैं। वह कभी ‘नाना’ तो कभी ‘छोटा राजन’  के नाम से जाना जाता। छोटा राजन की क्रिमिनल सीवी में पहला वर्किंग एक्सपीरियंस था सिनेमा टिकट ब्लैक करने का। तब उसकी उम्र थी महज 10 साल। 1960 में पैदा हुआ राजेंद्र सदाशिव निखलजे 1970 में हिन्दुस्तान की आर्थिक राजधानी में टिकटें ब्लैक कर रहा था। इसी दौरान छोटा राजन की मुलाकात राजन नायर ऊर्फ अन्ना राजन से हुई। वह उसके गैंग में शामिल हो गया। राजेंद्र सदाशिव निखलजे को ‘छोटा’ विशेषण ‘बड़ा’ राजन अन्ना ने ही दिया। तिहाड़ की सीखचों के पीछे बंद छोटा राजन आज भले ही कानून की गिरफ्त में है, लेकिन कभी उसका साम्राज्य हजारों करोड़ का था। मुंबई पुलिस द्वारा तैयार किये गये डोजियर के मुताबिक मुंबई से मलेशिया, थाइलैंड से सिंगापुर, इंडोनेशिया से जिम्बाब्वे में फैली गुनाहों की उसकी दुनिया में 4 से 5 हजार करोड़ रुपये लगे हैं।

मुंबई में जब डॉन दाऊद इब्राहिम का सिक्का चलता था तो छोटा राजन नंबर-2 हुआ करता था। दाऊद और छोटा राजन की दोस्ती की कहानी फिल्मी अफसाने की तरह है। लेकिन 1988 खत्म होते-होते इस दाऊद गैंग में एंट्री होती है शकील अहमद उर्फ छोटा शकील की। ये शख्स भी अपने करतूतों की वजह से दाऊद की गुड बुक्स में आ गया। अब दाऊद के पास छोटा शकील और छोटा राजन दो ऐसे मोहरे थे जिस पर वह दांव लगाता। जल्द ही इन दोनों के बीच डॉन दाऊद के सामने बेस्ट साबित करने की होड़ लगने लगी। हालांकि छोटा राजन अब भी दाऊद का सबसे बड़ा वफादार और राजदार था। लेकिन छोटा शकील के खासम-खास गाहे-बगाहे दाऊद का कान भरने लगे थे। शरद शेट्टी और सावत्या को ‘नाना’ का रौब अच्छा नहीं लगता।

घड़ी का पहिया घुमते-घुमते 1992 तक आ चुका था। देश में राम मंदिर आंदोलन का दौर था। इसी दौरान अरुण गवली गैंग ने कुछ ऐसा किया कि दाऊद-राजन की दोस्ती में दरार पड़ गई। 26 जुलाई 1992 को गवली के गुर्गों ने दाऊद के जीजा इब्राहिम पारकर की हत्या कर दी। इब्राहिम पारकर दाऊद की बहन हसीना का शौहर था। इस घटना से दाऊद काफी दुखी था। उसके तुरंत बदला चाहिए था। गैंग में नंबर दो होने की वजह से छोटा राजन की जिम्मेदारी थी कि वह अपने बॉस के जीजा के हत्यारों को सबक सिखाए। दाऊद पर किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार हरिगोविंद विश्वकर्मा के मुताबिक छोटा राजन ने अपने आदमियों को कहा कि शूटर शैलेश हल्दनकर और बिपिन शेरे को जल्द ठिकाना लगाया जाए। ये दोनों जेजे अस्पताल में जख्मी हालत में भर्ती थे। छोटा राजन ने दाऊद को बताया कि वह पारकर भाई के हत्यारों का बदला लेने को तैयार है। लेकिन वे अस्पताल में संगीनों के साये में हैं, जिससे शूटर वहां पहुंच नहीं पा रहे। अस्पताल से बाहर निकलते ही उन्हें मौत दी जाएगी।

इस मौके को भांपकर छोटा शकील दाऊद के पास गया और कहा कि कि छोटा राजन बदला लेने पर सीरियस नहीं है। इस बार उसे एक मौका दिया जाए। बहनोई की हत्या का बदला लेने के गुस्से में जल रहा दाऊद ने छोटा राजन से बिना पूछे ही गो अहेड कह दिया। वो दिन था 12 नवंबर 1992। सावत्या समेत 24 खतरनाक शूटर मुंबई के जेजे अस्पताल में पूरी सुरक्षा व्यवस्था को भेदकर अंदर पहुंचे और शैलेश हल्दनकर को भूनकर रख दिया। इस हमले में 500 राउंड गोलियां चलीं, दो पुलिसवाले शहीद हुए। इस घटना के बाद छोटा राजन बैकफुट पर था। वह चुप रह गया। ये एक ऐसा कांड था जिसने छोटा राजन को हिलाकर रख दिया। छोटा राजन समझ गया कि दाऊद के रास्ते अलग होते जा रहे हैं। इसके बंबई बम धमाके ने दोनों को एक दूसरे का कट्टर दुश्मन बना दिया।

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