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मौत के 121 साल बाद सीएम फडणवीस को याद आए ज्योतिबा और सावित्रीवाई फुले, मांगा ‘भारत रत्न’, जानें- क्यों?

ज्योतिबा विचारक, समाज सुधारक, जाति-विरोधी कार्यकर्ता और लेखक थे। उनकी पत्नी उनके विचारों की सहगामी थीं। इसके अलावा वो शिक्षाविद और कवयित्री थीं। उन्होंने दहेज प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई थी।

महाराष्ट्र के सीएम देंवेंद्र फडणवीस के साथ राज्य के सामाजिक न्याय मंत्री दिलीप कांबले (Facebook Photo)

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने 19वीं सदी के मशहूर समाज सुधारक दंपत्ति ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को मरणोपरांत देश का सर्वोच्च नागरिक अलंकरण ‘भारत रत्न’ देने की सिफारिश केंद्र सरकार से की है। सीएम फडणवीस ने मंगलवार (07 अगस्त) को खुद इसकी जानकारी दी। वो मुंबई में ओबीसी महासंघ के सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे। बता दें कि सीएम ने इस दंपत्ति को उनकी मौत के करीब 121 साल बाद उन्हें भारत रत्न देने की मांग की है। हालांकि, दो साल पहले भी उन्होंने ऐसा कहा था। सीएम ने इस मौके पर फुले दंपत्ति के सामाजिक कार्यों की तारीफ की और कहा कि 19वीं सदी में ही उन्होंने नारी शिक्षा पर जोर दिया था। ज्योतिबा का निधन 28 नवंबर, 1890 और सावित्रीबाई फुले का निधन 10 मार्च, 1897 को हुआ था।

दरअसल, ये समाज सुधारक दंपत्ति ओबीसी वर्ग से आते हैं। महाराष्ट्र समेत देशभर का ओबीसी समाज इन्हें महात्मा के रूप में पुकारता है और उनके बताए रास्ते पर चलने की कसमें वादे खाता है। जाहिर है कि उन्हें सम्मानित करने का साफ-साफ मतलब ओबीसी वर्ग को संतुष्ट करने से है। बता दें कि महाराष्ट्र में कुल आबादी का 54 फीसदी हिस्सा ओबीसी समुदाय का है। अगले साल लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव होने हैं, जबकि मराठा समुदाय आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहा है। ऐसे में भाजपा की नजर ओबीसी मतदाताओं पर है। फडणवीस ने इसे देखते हुए राज्य के 19 जिलों में ओबीसी छात्रों के लिए हॉस्टल बनाने की भी घोषणा की है। इसके अलावा ओबीसी कॉरपोरेशन के लिए 500 करोड़ रुपये देने की घोषणा की। एक साल पहले ही फडणवीस ने राज्य में ओबीसी विभाग का भी गठन किया था और 3000 करोड़ रुपये आवंटित किए थे ताकि ओबीसी समुदाय के लोगों की शिक्षा और रोजगार पर खर्च किया जा सके।

राजनीतिक जानकारों का कहना है कि फडणवीस सरकार मराठा आंदोलन से उपजे साइड इफेक्ट को कम करना चाहती है। वैसे तो राज्य में ओबीसी समुदाय का बड़ा हिस्सा भाजपा का वोट बैंक रहा है मगर मराठा आंदोलन के बाद उन्हें लगने लगा है कि सरकार पहले से मिल रहे 27 फीसदी के ओबीसी कोटे में ही मराठाओं को भी आरक्षण देगी। इससे शिक्षा और रोजगार में उनके कोटे में कटौती हो सकती है। इस संदेह की वजह से कहीं ओबीसी समुदाय भाजपा से छिटक न जाए, इसलिए फडणवीस ज्योतिबा और सावित्राबाई फूले का सहारा लेना चाह रही है। बता दें कि मराठा समुदाय शिक्षा और रोजगार में 16 फीसदी आरक्षण की मांग कर रहा है जो मौजूदा सांवैधानिक प्रावधानों के तहत मुश्किल लगता है। चूंकि सभी दल मराठों को आरक्षण देने के हिमायती हैं, ऐसे में उन्हें ओबीसी में शामिल कर इसका फायदा दिया जा सकता है। हालांकि, मराठों की कई जातियां पहले से ही ओबीसी में शामिल हैं।

इस दंपत्ति ने 19वीं सदी में समाज में व्याप्त जाति प्रथा, छुआछूत के खिलाफ संघर्ष किया था और हिंदू समाज में नीच समझी जानेवाली जाति के लोगों को समान अधिकार दिलाने के लिए 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी।

कौन थे ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले?
फुले दंपत्ति ओबीसी समुदाय से थे। दोनों का परिवार निचले तबके का था। 13 वर्ष के ज्योतिबा की शादी 9 साल की सावित्राबाई से हुई थी। ज्योतिबा विचारक, समाज सुधारक, जाति-विरोधी कार्यकर्ता और लेखक थे। उनकी पत्नी उनके विचारों की सहगामी थीं। इसके अलावा वो शिक्षाविद और कवयित्री थीं। उन्होंने दहेज प्रथा के खिलाफ आवाज उठाई थी। इस दंपत्ति ने 19वीं सदी में समाज में व्याप्त जाति प्रथा, छुआछूत के खिलाफ संघर्ष किया था और हिंदू समाज में नीच समझी जानेवाली जाति के लोगों को समान अधिकार दिलाने के लिए 1873 में सत्यशोधक समाज की स्थापना की थी। सावित्रीबाई को देश की प्रथम शिक्षित महिला कहा जाता है। उन्होंने 19वीं सदी में महिलाओं को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया था और इसके लिए 18 बालिका विद्यालय की स्थापना की थी।

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