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Maharashtra Assembly Elections: भाजपा-शिवसेना गठबंधन को रोकना कांग्रेस-राकांपा के लिए चुनौती

Maharashtra Assembly Elections: महाराष्ट्र में कांग्रेस मराठा-दलित-मुसलिम गठजोड़ के दम पर चुनाव जीतती आई। दलित और मुसलिम पारंपरिक रूप से कांग्रेस के साथ खड़े रहे जबकि सूबे के 18 मुख्यमंत्रियों में से 10 मुख्यमंत्री मराठा हुए। जाहिर तौर पर कांग्रेस ने मराठा नेताओं को तवज्जो दी। महाराष्ट्र में मराठा-कुनबी मिलाकर करीब 31 फीसद मतदाता बनते हैं जबकि अनुसूचित जाति व जनजाति के मतदाताओं की संख्या क्रमश: 12 व 9 फीसद है।

Author Updated: October 9, 2019 2:17 AM
उद्धव ठाकरे के साथ अमित शाह ( फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस)

अजय पांडेय

Maharashtra Assembly Elections: कभी कांग्रेस का अभेद्य सियासी दुर्ग समझे जाने वाले महाराष्ट्र में पार्टी का कुनबा बिखरा हुआ है और इसी महीने हो रहे विधानसभा चुनाव में उसके सामने अपनी सियासी जमीन को बचाए रखने की चुनौती है। कुछ ही महीनों पहले हुए लोकसभा चुनाव में पार्टी शरद पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ चुनावी गठबंधन के बावजूद सूबे की 48 संसदीय सीटों में से महज एक सीट जीत पाई। ऐसे में माना जा रहा है कि विपक्ष के इस गठबंधन के लिए विधानसभा चुनाव में भी भाजपा-शिवसेना के विजय रथ को रोक पाना आसान नहीं होगा।

महाराष्ट्र विधानसभा के 2014 में हुए चुनाव में मुकाबला चौतरफा था। भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस और राकांपा ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। 288 सीटों वाली विधानसभा में 122 सीट लेकर भाजपा पहले नंबर पर रही। शिवसेना को 63, कांग्रेस को 42 और राकांपा को 41 सीटें मिली थीं। भाजपा ने अल्पमत की सरकार बनाई। बाद में शिवसेना सरकार में शामिल हुई। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस-राकांपा गठजोड़ को 48 में से पांच सीटें मिली। अब कांग्रेस-राकांपा समझौते के मुताबिक 125-125 सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं। बाकी सीटें अन्य सहयोगी दलों के लिए छोड़ी गई हैं।

महाराष्ट्र में कांग्रेस को अपना खिसकता जनाधार बचाने के अलावा नेताओं की आपसी कलह से निपटने की चुनौती है। कांग्रेसी नेताओं में पार्टी पर वर्चस्व को लेकर अंदरखाने जबरदस्त लड़ाई है। सूबे में कांग्रेस का एक भी ऐसा नेता नहीं है, जिसकी पकड़ समूचे प्रदेश पर हो। पार्टी में कभी यशवंतराव चव्हाण, शंकर राव चव्हाण, विलासराव देशमुख, मुरली देवड़ा, गुरुदास कामत सरीखे कद्दावर नेता थे, लेकिन आज स्थिति बिल्कुल उलट है।

पूर्व मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण सूबे में अपना असर रखते हैं पर उनका गुट एक ओर है और बाकी कई अन्य नेता अलग मोर्चा खोले हैं। पूर्व मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण भी सक्रिय हैं लेकिन पार्टी ने बाला साहेब थोरात को प्रदेश की कमान देकर एक अलग दांव चला है। जानकारों का कहना है कि कांग्रेस केवल मराठा नेताओं के भरोसे महाराष्ट्र नहीं जीत सकती। सुशील कुमार शिंदे सरीखे ताकतवर दलित नेता अब चमक खो चुके हैं। दूसरी ओर प्रकाश आंबेडकर ने एक नई पार्टी बनाकर कांग्रेस के दलित वोट बैंक में जबरदस्त सेंध लगा दी है। बीते कुछ महीनों में भाजपा-शिवसेना ने भी कांग्रेस व राकांपा में जमकर सेंध लगाई। महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष व कांग्रेस विधायक दल के नेता राधाकृष्ण विखे पाटील पार्टी छोड़ गए। कई अन्य विधायकों ने भी पार्टी से नाता तोड़ लिया। मुंबई में उत्तर भारतीयों पर अच्छी पकड़ रखने वाले कृपाशंकर सिंह ने भी कांग्रेस का साथ छोड़ा। मुंबई कांग्रेस के पूर्व प्रधान संजय निरूपम खुलेआम पार्टी छोड़ने की धमकी दे रहे हैं।

महाराष्ट्र में कांग्रेस मराठा-दलित-मुसलिम गठजोड़ के दम पर चुनाव जीतती आई। दलित और मुसलिम पारंपरिक रूप से कांग्रेस के साथ खड़े रहे जबकि सूबे के 18 मुख्यमंत्रियों में से 10 मुख्यमंत्री मराठा हुए। जाहिर तौर पर कांग्रेस ने मराठा नेताओं को तवज्जो दी। महाराष्ट्र में मराठा-कुनबी मिलाकर करीब 31 फीसद मतदाता बनते हैं जबकि अनुसूचित जाति व जनजाति के मतदाताओं की संख्या क्रमश: 12 व 9 फीसद है। इसी प्रकार मुसलिम मतदाताओं की संख्या करीब 11.56 फीसद है।

मराठा-दलित-मुसलिम गठजोड़ एक बेहद मजबूत सियासी गठजोड़ रहा है लेकिन बीते कुछ वर्षों में कांग्रेस का यह वोट बैंक बुरी तरह खिसका है।प्रकाश आंबेडकर की वंचित बहुजन अघाड़ी और असदुद्दीन ओवैसी की ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुसलमीन कुछ हद यह साबित करने में सफल साबित हो रहे हैं कि कांग्रेस ने दशकों से उनका उपयोग केवल वोट बैंक के तौर पर किया, बदले में उन्हें कुछ दिया नहीं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इन दलों की मौजूदगी का खामियाजा भुगता। इसके बावजूद उसने आंबेडकर की पार्टी से चुनावी समझौता नहीं किया। बताते हैं कि आंबेडकर की शर्त थी कि कांग्रेस को राकांपा का साथ छोड़ना होगा, जिसे कांग्रेस ने सिरे से खारिज कर दिया।

सियासी पंडितों का यह भी कहना है कि यदि कांग्रेस को महाराष्ट्र जीतना है तो उसे मुंबई पर कब्जा जमाना होगा, जहां आज उसकी हालत बेहद खराब है। पार्टी की बागडोर 80 साल के उम्रदराज एकनाथ गायकवाड के हाथ में है और नेताओं के बीच लड़ाई चरम पर है। मुंबई की 36 विधानसभा सीटों में यदि ठाणे और पालघर की सीटों को भी जोड़ दें, तो यह आंकड़ा 60 हो जाता है। पिछली बार मुंबई की 36 में से कांग्रेस को महज पांच सीटें मिल पाई थीं। पार्टी से नाराज संजय निरुपम की मानें तो इस बार यह आंकड़ा और नीचे आ सकता है। जाहिर है कि कांग्रेस-राकांपा गठजोड़ के लिए विधानसभा का यह चुनाव किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है।

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