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महाराष्ट्र में गांव वालों ने पेश की मिसाल, अफवाहों से होने वाली मॉब लिंचिंग से यूं मिली निजात

पंचायत समितियों के जरिये लोगों से वॉट्सएप के नफरत फैलाने वाले मैसेज पर ध्यान न देने की अपील की गई। इसके अलावा गांवों में आने वाले सैल्समेन और दूसरे लोगों के नाम, पते और नंबर को 'मुसाफिर रजिस्टर' में दर्ज किया गया।

वॉट्सएप पर हुआ तलाक (प्रतीकात्मक तस्वीर)

वॉट्सएप, फेसबुक जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स के जरिये आने वाले फर्जी मैसेज, अफवाहों और छेड़छाड़ किए हुए वीडियो फैलने के चलते भीड़ का उग्र होना पूरे देश की समस्या है। इसी भटकाव के चलते मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं। महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों में भी यह बड़ी मुसीबत बन गई थी। एक आंकड़े के मुताबिक बच्चा चोरी की एक अफवाह के चलते राज्य के 12 जिलों में दो महीनों के भीतर नौ लोगों की मौत हुई थी। लेकिन पिछले छह महीनों में यहां तस्वीर बदल गई है। बदलाव की शुरुआत बुलढाणा जिले की खामगांव तहसील के सबसे बड़े गांव अटाली से हुई।

अटाली के रहने वाले शकील देशमुख बताते हैं कि दो महीनों तक लगातार लोगों को डरने और पड़ोसियों पर शक करने से बचने के लिए जागरूकता कार्यक्रम और चर्चाएं की गईं। अब यहां के लोग देर रात तक जाग कर परछाइयों का पीछा नहीं करते। शकील के मुताबिक, ‘गांव में पांच वॉट्सएप ग्रुप हैं और हर परिवार उनका हिस्सा है। पिछले साल लोगों ने रिश्तेदारों से मिली बच्चा चोरी की अफवाहों को ग्रुप में बताया। इसके बाद तुरंत उन्होंने जानकारी निकालकर बताया कि यह फर्जी खबर है। अफवाहों को दूर करने की जिम्मेदारी ग्रुप एडमिन को दी गई।’

ग्रामीण महाराष्ट्र में कई जगहों पर 50-50 गांवों की जिम्मेदारी एक पुलिस थाने प्रतिनिधि के भरोसे होती है। ऐसे में पुलिस पाटिल (नागरिक पुलिस प्रतिनिधि) ही जमीनी स्तर पर खुफिया जानकारी जुटाकर शांति बनाए रखने में मदद करती है। करीब एक दशक की अपनी नौकरी में शकील देशमुख एकमात्र मुस्लिम पुलिसकर्मी हैं जो हिंदू बाहुल्य गांव में तैनात हैं। उन्हें कई जगहों पर लिंचिंग जैसी स्थितियों से निपटना पड़ता था। ऐसे मौकों पर तनाव बहुत जल्दी खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है।

देशमुख बताते हैं, ‘जुलाई में अंधेरा होने के बाद दो लोग भीड़ से बचने के लिए खेतों में दौड़ रहे थे। देशमुख के हस्तक्षेप के बाद पता चला कि वे स्थानीय लोग ही हैं। दीवाली के ठीक बाद चोरों ने 10 घरों में करीब 50 हजार रुपए के सामान पर हाथ साफ कर दिया था। इसके बाद कार में सवार कुछ लोग गांव के बस स्टैंड पर खड़े थे। उन्हें करीब चार दर्जन लोगों की भीड़ ने घेर लिया। अगर वो वहां से भाग नहीं पाते तो कुछ भी हो सकता था।’

…और उठाए ये कदमः पंचायत समितियों के जरिये लोगों से वॉट्सएप के नफरत फैलाने वाले मैसेज पर ध्यान न देने की अपील की गई। इसके अलावा गांवों में आने वाले सैल्समेन और दूसरे लोगों के नाम, पते और नंबर को ‘मुसाफिर रजिस्टर’ में दर्ज किया गया। जनजातीय वर्ग के लोगों ने खुद पुलिस को अपनी जानकारी देकर रजिस्ट्रेशन कराया ताकि वे भीड़ का शिकार बनने से बच सकें। धीरे-धीरे ये जानकारियां सभी गांवों तक पहुंचाई गई।

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