Maharashtra: To snatch power in Nashik zila parishad Shiv Sena scripted friendship with arch rival Congress and CPI(M), Sidelined BJP - बीजेपी की सहयोगी और कट्टरपंथी बताने वाली शिवसेना से वामपंथी माकपा ने मिलाया हाथ, समर्थन देकर बनवाया नाशिक जिला परिषद अध्यक्ष - Jansatta
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बीजेपी की सहयोगी और कट्टरपंथी बताने वाली शिवसेना से वामपंथी माकपा ने मिलाया हाथ, समर्थन देकर बनवाया नाशिक जिला परिषद अध्यक्ष

राजनीतिक मौकापरस्ती का ये उदाहरण सिर्फ नाशिक जिला परिषद में ही देखने को नहीं मिला है, जालना में एनसीपी और शिवसेना ने सत्ता में आने के लिए हाथ मिला लिया है, जबकि यवतमाल में बीजेपी ने सत्ता में आने के लिए कांग्रेस और एनसीपी से दोस्ती कर ली है और शिवसेना को अलग-थलग कर दिया है

शिव सेना प्रमुख उद्धव ठाकरे (बाएं) ने महाराष्ट्र नगर निकाय चुनाव में भाजपा से अपना 25 साल पुराना गठबंधन तोड़कर चुनाव लड़ा था। (फाइल फोटो)

महाराष्ट्र के नगर निकायों में सत्ता हथियाने के लिए दिलचस्प राजनीतिक समीकरण देखने को मिल रहा है, जहां राजनीतिक दलों ने कुर्सी हथियाने के लिए राजनीतिक सिद्धांतों को तिलांजलि दे दी है। महाराष्ट्र में सत्ता हासिल करने के लिए कट्टर हिंदुत्व की छवि रखने वाली शिवसेना अपने धुर विरोधी वामपंथियों से हाथ मिला रही है तो बीजेपी कई नगर निकायों में अपनी पुरानी सहयोगी शिवसेना को दरकिनार कर कांग्रेस और एनसीपी से हाथ मिला रही है।

नाशिक जिला परिषद में ऐसा ही अवसरवाद का एक गठबंधन देखने को मिला। यहां शिवसेना की शीतल सांगले कांग्रेस के 8 और सीपीएम के 3 सदस्यों के सहयोग से जिला परिषद की अध्यक्ष बनीं। जबकि कांग्रेस की नयना गावित जिला परिषद की उपाध्यक्ष बनी हैं।शिवसेना ने यहां बीजेपी का साथ नहीं लिया जिसके 15 सदस्य जिला परिषद चुनाव में जीते हैं। नाशिक जिला परिषद में शिवसेना के 24 सदस्य जीते हैं।

इस साल शिवसेना और बीजेपी ने अपनी 25 साल पुरानी दोस्ती को तोड़ते हुए महाराष्ट्र नगर निकाय का चुनाव अलग अलग लड़ा था। इसके बाद से ही सियासत के दोनों दोस्तों के बीच तनाव चल रहा है। हालांकि चुनाव के बाद बीजेपी ने दरियादिली दिखाई थी, और बीएमसी में मेयर पद के चुनाव के लिए शिवसेना को सपोर्ट दिया था। बावजूद इसके नाशिक जिला परिषद की घटना बताती है कि दोनों के रिश्ते कड़वाहट के दौर से आगे नहीं बढ़ पाये हैं।

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(Video source- Youtube/TV9)

हालांकि सिर्फ राजनीतिक मौकापरस्ती का ये उदाहरण सिर्फ नाशिक जिला परिषद में ही देखने को नहीं मिला है, जालना में एनसीपी और शिवसेना ने सत्ता में आने के लिए हाथ मिला लिया है, जबकि यवतमाल में बीजेपी ने सत्ता में आने के लिए कांग्रेस और एनसीपी से दोस्ती कर ली है और शिवसेना को अलग-थलग कर दिया है, जबकि यवतमाल निकाय चुनाव में शिवसेना सबसे बड़ी पार्टी थी। अमरावती सत्ता पर कब्जे की दौड़ में कांग्रेस ने बाजी मारी है, यहां जिला परिषद के अध्यक्ष पद पर कब्जा करने के लिए कांग्रेस ने एनसीपी और शिवसेना से दोस्ती कर ली। अगर बात औरंगाबाद निकाय की करें तो यहां शिवेसना कांग्रेस की मदद से सत्ता में आई है।

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